श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 157
 
 
श्लोक  2.1.157 
मर्म-शल्येन चैतेन
निर्वेदो मे महान् अभूत्
नेशे दिदृक्षितं साक्षात्
प्राप्तं त्यक्तुं च तत्-प्रभुम्
 
 
अनुवाद
मेरे प्राणों में चुभते ऐसे तीरों ने मुझे सब कुछ त्याग देने को विवश कर दिया। लेकिन मैं उस प्रभु को छोड़ने को तैयार नहीं था, जिनके दर्शन के लिए मैं बहुत समय से लालायित था और जिनका साक्षात् साक्षात्कार अब मुझे प्राप्त हो चुका था।
 
These arrows piercing my soul compelled me to abandon everything. But I was unwilling to abandon the Lord, whom I had longed to see and whose direct vision I had now attained.
तात्पर्य
जब उन्होंने समाज के नेताओं को विष्णु जी के प्रसाद को ठुकराते हुए देखा तो गोप-कुमार को नुकीले तीरों के घायलों से भी ज्यादा कष्ट हुआ। जो व्यक्ति प्राणवायु को ले जाने वाले सूक्ष्म चैनलों के बड़े जोड़ पर कट जाता है उसे असहनीय पीड़ा होती है। लेकिन गोप-कुमार के लिए भगवान विष्णु की सेवा में अपराधों को देखना और सहन करना उस घाव से भी ज्यादा पीड़ादायक था। राजकाज के साथ अपनी भागीदारी जारी रखने का जो भी उत्साह उनके मन में था वो खत्म हो गया, लेकिन वो भगवान विष्णु को नहीं छोड़ सकते थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)