श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 156
 
 
श्लोक  2.1.156 
जगद्-ईश्वर-नैवेद्यं
स्पृष्टम् अन्येन केनचित्
नीतं बहिर् वा सन्दिग्धो
न भुङ्क्ते को ’पि सज्-जनः
 
 
अनुवाद
यदि परमेश्वर के अवशेषों को किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा छू लिया जाता, या मंदिर के बाहर ले जाया जाता, या किसी अन्य कारण से अवशेषों की शुद्धता के बारे में संदेह उत्पन्न होता, तो कोई भी सम्मानित व्यक्ति उन्हें नहीं खाता।
 
If the Lord's relics were touched by an outsider, or taken outside the temple, or if for any other reason doubt arose about the purity of the relics, no respectable person would eat them.
तात्पर्य
गोपा-कुमार को निश्चित ही प्रभु की सेवा से उत्पन्न होने वाली किसी भी परेशानी को सहन करना चाहिए था, लेकिन गोपा-कुमार की भक्ति सेवा में आने वाली गंभीर बाधाएँ उन्हें शाही राजनीति की छोटी-मोटी जटिलताओं से कहीं अधिक भड़काती थीं। इस क्षेत्र के ब्राह्मण अपने द्वारा स्वीकार किए गए भोजन के बारे में बहुत सख्त थे। वे भगवान विष्णु का प्रसाद स्वीकार नहीं करते थे यदि उसे देवता के नियुक्त सेवकों के अलावा किसी अन्य ने छुआ हो या मंदिर के पवित्र क्षेत्र से बाहर ले जाया गया हो। इन ब्राह्मणों ने अपनी शंकाओं के समर्थन में सुसंस्कृत व्यवहार की परंपरा का हवाला दिया: उनके पूर्वजों ने कभी भी प्रसाद स्वीकार नहीं किया था जो इन तरीकों से दूषित हो चुका था। हालाँकि, असली ब्राह्मण और वैष्णव ऐसा व्यवहार देखकर दुखी हो जाते हैं; उनके लिए उस जगह में रहना मुश्किल होता है जहाँ सर्वोच्च प्रभु के प्रसाद का ऐसा अनादर किया जाता है। इसके अलावा, इस मामले पर उनकी राय श्री बृहद-विष्णु पुराण जैसे शास्त्रों में समर्थित है:

नैवेद्यं जगद्-ईशस्य

अन्न-पानादिकं च यत्

भक्ष्याभक्ष्य-विचारस्तु

नास्ति तद्-भक्षणे द्विज

ब्रह्म-वन निर्विकारं हि

यथा विष्णुस्तथैव तत्

विचारं ये प्रकुर्वन्ति

भक्षणे तद् द्विजातयः

कुष्ठ-व्याधि-समायुक्त

पुत्र-दार-विवर्जित

निरयं यान्ति ते विप्रा

यस्मान्नावर्तते पुनः

"हे द्विज, किसी को भी कभी भी यह प्रश्न नहीं करना चाहिए कि ब्रह्मांड के स्वामी को अर्पित भोजन और पेय के अवशेष खाने लायक हैं या नहीं। किसी को भी ऐसा भेद नहीं करना चाहिए। प्रभु का प्रसाद वैदिक मंत्रों और स्वयं भगवान विष्णु की तरह ही अविनाशी है। जो लोग विचार करते हैं कि प्रभु का प्रसाद खाने योग्य है या नहीं, वे कुष्ठ रोग से पीड़ित होंगे। वे अपने बच्चों और पत्नियों को खो देंगे, हे ब्राह्मण, और नरक में जाएँगे, जहाँ से फिर कभी नहीं लौट पाएँगे।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)