नैवेद्यं जगद्-ईशस्य
अन्न-पानादिकं च यत्
भक्ष्याभक्ष्य-विचारस्तु
नास्ति तद्-भक्षणे द्विज
ब्रह्म-वन निर्विकारं हि
यथा विष्णुस्तथैव तत्
विचारं ये प्रकुर्वन्ति
भक्षणे तद् द्विजातयः
कुष्ठ-व्याधि-समायुक्त
पुत्र-दार-विवर्जित
निरयं यान्ति ते विप्रा
यस्मान्नावर्तते पुनः
"हे द्विज, किसी को भी कभी भी यह प्रश्न नहीं करना चाहिए कि ब्रह्मांड के स्वामी को अर्पित भोजन और पेय के अवशेष खाने लायक हैं या नहीं। किसी को भी ऐसा भेद नहीं करना चाहिए। प्रभु का प्रसाद वैदिक मंत्रों और स्वयं भगवान विष्णु की तरह ही अविनाशी है। जो लोग विचार करते हैं कि प्रभु का प्रसाद खाने योग्य है या नहीं, वे कुष्ठ रोग से पीड़ित होंगे। वे अपने बच्चों और पत्नियों को खो देंगे, हे ब्राह्मण, और नरक में जाएँगे, जहाँ से फिर कभी नहीं लौट पाएँगे।"
