श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 155
 
 
श्लोक  2.1.155 
कदापि पर-राष्ट्राद् भीः
कदाचिच् चक्रवर्तिनः
विविधादेश-सन्दोह-
पालनेनास्वतन्त्रता
 
 
अनुवाद
कभी मुझे पड़ोसी राज्यों का डर लगता था, तो कभी सम्राट का। उनके विविध और प्रचुर आदेशों का पालन करने से मेरी स्वतंत्रता का गला घोंट दिया जाता था।
 
Sometimes I feared the neighboring kingdoms, sometimes the Emperor. Obeying their varied and numerous orders stifled my freedom.
तात्पर्य
प्रत्येक राजा के दुश्मन होते हैं, जिसमें उसके अपने ही राज्य के दुखी नागरिकों के साथ-साथ प्रतिद्वंद्वी राज्यों के शासक भी शामिल होते हैं। यदि वह किसी महान राजा का जागीरदार है, तो उसे अपने स्वामी की इच्छाओं का पालन करना होगा और वह स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं कर सकता। गोपकुमार ने ये सभी चिंताएं महसूस कीं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)