श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 150
 
 
श्लोक  2.1.150 
एवं दिनानि कतिचित्
सानन्दं तत्र तिष्ठतः
तादृक्-पूजा-विधाने मे
परमा लालसाजनि
 
 
अनुवाद
इस प्रकार उस स्थान पर कुछ दिन रहने पर मुझमें उस पूजा पद्धति में संलग्न होने की तीव्र इच्छा उत्पन्न हुई।
 
Thus, after staying at that place for a few days, I developed a strong desire to engage in that worship system.
तात्पर्य
गोप-कुमार भगवान का व्यक्तिगत तौर पर प्रत्युत्तर देने के लिए उत्सुक थे, और विष्णु मंदिर में भव्य पूजा उसे ऐसा साधन लगी।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)