श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  2.1.15 
तत्र श्री-कृष्ण-पादाब्ज-
साक्षात्-सेवा-सुखं सदा
बहुधानुभवन्तस् ते
रमन्ते धिक्-कृतामृतम्
 
 
अनुवाद
वैकुंठ में रहने वाले शुद्ध भक्त, श्रीकृष्ण के चरणकमलों की प्रत्यक्ष सेवा का सुख विभिन्न प्रकार से सदा-सर्वदा भोगते रहते हैं। इसकी तुलना में, मोक्षरूपी अमृत निंदित प्रतीत होता है।
 
Pure devotees living in Vaikuntha always enjoy the pleasure of direct service at the lotus feet of Shri Krishna in various ways. In comparison, the nectar of salvation appears condemned.
तात्पर्य
वैकुण्ठवासियों के लिए भगवान दूर की काल्पनिक चीज़ नहीं है। वे उसे हमेशा देखते हैं और उसकी सेवा प्रत्यक्ष रूप से करते हैं। उनके लिए यह सेवा कभी भी कष्टदायक या अपमानजनक नहीं होती, बल्कि हमेशा मात्र आनंद होती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)