श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 149
 
 
श्लोक  2.1.149 
अस्यास् तु व्रज-भूमेः श्रीर्
गोप-क्रीडा-सुखं च तत्
कदाचिद् अपि मे ब्रह्मन्
हृदयान् नापसर्पति
 
 
अनुवाद
फिर भी हे ब्राह्मण! मेरा हृदय इस व्रजभूमि की सुन्दरता तथा यहाँ ग्वाल-बालों के रूप में खेलने के आनन्द को कभी नहीं भूला।
 
Yet, O Brahmin, my heart has never forgotten the beauty of this land of Vraja and the joy of playing here as cowherd boys.
तात्पर्य
वृज-धाम की गोपा-कुमार की अमिट स्मृतियाँ सिर्फ भावनात्मक ही नहीं थीं, बल्कि एक निशानी थीं कि अपने मंत्र का जाप करने से वह पारलौकिक परिणाम पाते जा रहे थे। भगवान विष्णु की सार्वजनिक पूजा का वैभव उन्हें वृज के खेतों में घूमने-फिरने के साधारण सुख से ज्यादा आकर्षित नहीं कर पाया। सोते या जागते हुए, वह वृज को नहीं भूल पाते थे। यहाँ तक कि भगवान विष्णु के त्योहारों में भाग लेते समय भी उनके मन में वृज-भूमि के विचार घूमते रहते थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)