श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 148
 
 
श्लोक  2.1.148 
भुञ्जानो विष्णु-नैवेद्यं
पश्यन् पूजा-महोत्सवम्
शृण्वन् पूजादि-माहात्म्यं
यत्नान् मन्त्रं रहो जपन्
 
 
अनुवाद
मैं भगवान विष्णु को अर्पित भोजन के अवशेष खाता, उनकी पूजा के महान उत्सवों का साक्षी बनता, उनकी पूजा की महिमा सुनता तथा अन्य अनेक बातें करता, तथा इस दौरान एकांत में ध्यानपूर्वक अपने मंत्र का जप करता।
 
I would eat the remains of the food offered to Lord Vishnu, witness the great ceremonies of His worship, listen to the glories of His worship and do many other things, and all the while, in solitude, I would meditate and chant my mantra.
तात्पर्य
वैष्णवों के साथ रहने के दौरान जो भगवान विष्णु की देवता की सेवा करते थे, गोपा-कुमार ने उनसे विभिन्न पुराणों और अन्य ग्रंथों में बताए गए अनुसार भगवान विष्णु की पूजा की महिमा के बारे में सुना। उन्होंने सुना कि विष्णु की पूजा करना मनुष्य के लिए सबसे बड़ी क्रिया है, और उन्होंने उनकी पूजा के विभिन्न पहलुओं के बारे में विशिष्ट निर्देश सुने। उन्होंने भगवान विष्णु के प्रसाद के महिमा के बारे में भी सुना:

षड्भिर् मासोपवासैस्तु

यत् फलं परिकीर्तितम्

विष्णोर्नैवेद्य-सिथान्नं

भुंजतां तत् कलियुगे

"छह महीने उपवास करने के व्रत से प्राप्त सभी लाभ कलियुग में उन लोगों द्वारा प्राप्त किए जाते हैं जो भगवान विष्णु को चढ़ाया हुआ उबला हुआ चावल खाते हैं।"

हालाँकि, इन सभी निर्देशों से, गोपा-कुमार को पूर्ण, व्यवस्थित आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त नहीं हुई। उदाहरण के लिए, किसी ने उन्हें मूल बातों के बारे में नहीं बताया, जैसे कि उच्च ग्रहों का अस्तित्व, जैसे कि भगवान इंद्र का स्वर्ग। वैष्णव इस बात से अनजान थे कि गोपा-कुमार, अपने संत गुणों के बावजूद, किसी प्रकार का कोई प्रशिक्षण कभी नहीं मिला था। इस प्रकार उन्होंने भौतिक जगत की जटिलताओं के बारे में भोले ही रहे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)