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श्री बृहत् भागवतामृत
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खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य
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अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)
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श्लोक 146
श्लोक
2.1.146
परमानन्द-पूर्णो ’हं
प्रणमन् दण्ड-वन् मुहुः
व्यचिन्तयम् इदं स्वस्या-
पश्यम् अद्य दिदृक्षितम्
अनुवाद
परम आनंद से भरकर मैं बार-बार ज़मीन पर गिर पड़ा। मैंने सोचा, "आज मैंने वो देख लिया जो मैं हमेशा से देखना चाहता था।"
I fell to the ground again and again, filled with ecstasy. I thought, "Today I have seen what I have always wanted to see."
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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