श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 143
 
 
श्लोक  2.1.143 
विज्ञाय तत्र जगद्-ईश्वरम् ईक्षितुं तं
केनाप्य् अवारित-गतिः स-जवं प्रविश्य
शङ्खारि-पङ्कज-गदा-विलसत्-कराब्जं
श्रीमच्-चतुर्-भुजम् अपश्यम् अहं समक्षम्
 
 
अनुवाद
यह जानकर कि ब्रह्माण्ड के स्वामी की पूजा हो रही है, मैं उनके दर्शन करना चाहता था। जैसे ही मैं मंदिर के पास पहुँचा, किसी ने मुझे नहीं रोका, इसलिए मैं जल्दी से मंदिर में प्रवेश कर गया, जहाँ मेरे सामने भगवान का सुंदर चतुर्भुज रूप था, जिनके हाथ शंख, चक्र, कमल और गदा से शोभायमान थे।
 
Knowing that the Lord of the Universe was being worshipped, I wanted to see Him. As I approached the temple, no one stopped me, so I quickly entered, where before me stood the beautiful four-armed form of the Lord, adorned with a conch, a disc, a lotus, and a mace.
तात्पर्य
मंदिर के द्वार पर पहरा देने वाले सैनिकों ने न तो गोपा कुमार से कोई सवाल किया और न ही उसके प्रवेश को रोका, इसलिए वह उत्साह से भागकर अंदर चला गया। वहां उसने विष्णु की मूर्ति देखी, जिसकी सुंदरता और संपन्नता ब्राह्मण की भविष्यवाणियों और गोपा कुमार की अपनी अपेक्षाओं से कहीं अधिक थी। भगवान के चारों हाथ शक्तिशाली सांपों के शरीर से मिलते जुलते थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)