श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 141
 
 
श्लोक  2.1.141 
तद्-वाचानन्दितो ’गत्वा
क्षुधितो ’पि तद्-आलयम्
तं प्रणम्य तद्-उद्दिष्ट-
वर्त्मना तां पुरीम् अगाम्
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण के वचनों से प्रसन्न होकर मैंने उन्हें प्रणाम किया और उनके घर पर रुके बिना (भूख लगने पर भी) उनके बताये मार्ग से राजधानी की ओर चल पड़ा।
 
Pleased with the words of the Brahmin, I bowed to him and without stopping at his house (despite being hungry), I started towards the capital on the route he had told me.
तात्पर्य
गोप-कुमार ने अत्यधिक श्रद्धा के साथ ब्राह्मण के समक्ष बार-बार दंडवत प्रणाम किए। उन्होंने ऐसा आंशिक रूप से ब्राह्मण के निमंत्रण को अस्वीकार करने के लिए क्षमा याचना करने और आंशिक रूप से शुभ यात्रा के लिए आशीर्वाद लेने के लिए किया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)