श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  2.1.14 
वैकुण्ठं दुर्लभं मुक्तैः
सान्द्रानन्द-चिद्-आत्मकम्
निष्कामा ये तु तद्-भक्ता
लभन्ते सद्य एव तत्
 
 
अनुवाद
वह धाम, वैकुंठ, एकाग्र आनंद और शुद्ध चेतना से बना है। मुक्त आत्माओं के लिए भी इसे प्राप्त करना कठिन है। लेकिन भगवान के भक्त, जो स्वार्थी इच्छाओं से मुक्त हैं, तुरन्त वहाँ पहुँच जाते हैं।
 
That abode, Vaikuntha, is composed of concentrated bliss and pure consciousness. Even liberated souls find it difficult to attain. But devotees of the Lord, free from selfish desires, reach there instantly.
तात्पर्य
माँ उत्तर अब अपने पुत्र परीक्षित को वैकुण्ठ के पारलौकिक स्वरूप के बारे में अपनी समझ को बयाँ करती हैं। परीक्षित ने लगभग वैसी ही वैकुण्ठ के वातावरण की कुछ बातें श्रीमद भागवतम के दूसरे और दसवें अध्याय में शुकदेव गोस्वामी से सुनी थीं।

न यत्र कालोऽनिमिषां परः प्रभुः

कुतो नु देवा जगतां या ईशिरे

न यत्र सत्त्वं न रजस्तमश्च

न वै विकारो न महान् प्रधानम

परं पदं वैष्णवमामनन्ति तद्

यन्नेति नेतीत्य तदुत्सिसृक्षवः

विसृज्य दौरात्म्यमनन्य-सौहृदा

हृदोपगुह्यार्ह-पदं पदे पदे

"जो देवता नश्वर प्राणियों पर शासन करने के लिए सशक्त हैं, उस पारलौकिक अवस्था में विनाशकारी समय की सर्वोच्चता नहीं है जो स्वयं देवताओं को भी नियंत्रित करता है। वहां न तो भौतिक अच्छाई का भाव है, न जुनून, न अज्ञानता और न ही झूठा अहंकार है, न ही भौतिक कारण सागर है और न ही भौतिक प्रकृति है। पारलौकिकतावादी हर उस चीज से बचना चाहते हैं जिसमें ईश्वर न हो, क्योंकि वे उस सर्वोच्च परिस्थिति को जानते हैं जिसमें सब कुछ भगवान विष्णु से संबंधित है। इसलिए भगवान के साथ पूर्ण सामंजस्य में रहने वाला एक शुद्ध भक्त उलझन पैदा नहीं करता है, बल्कि हर पल भगवान के चरण कमलों की पूजा करता है, उन्हें अपने हृदय में बसाता है।" (भागवतम 2.2.17-18)

तस्मै स्व-लोकं भगवान् सभाजितः

संदर्शयमास परं न यत्-परम

व्यपेता-संकलेश-विमोह-साध्वसं

स्वदृष्टवद्भिर पुरुषिरभिष्टुतम

प्रवर्तते यत्र रजस्तमस्तयोः

सत्त्वं च मिश्रं न च काल-विक्रमः

न यत्र माया किमुतापरे हरर

अनुव्रता यत्र सुरासुरार्चिताः

"भगवान ब्रह्मा की तपस्या से बहुत संतुष्ट, भगवान का व्यक्तित्व, वैकुण्ठ, जो सभी ग्रहों से ऊपर का सर्वोच्च ग्रह है, प्रकट करने के लिए प्रसन्न थे। भगवान का वह पारलौकिक निवास सभी आत्म-साक्षात्कार करने वाले व्यक्तियों द्वारा पूजा जाता है जो सभी दुखों और भ्रमपूर्ण अस्तित्व के डर से मुक्त होते हैं। आध्यात्मिक दुनिया में न तो काम का भाव है, न अज्ञानता का भाव और न ही दोनों का मिश्रण है, न ही मिलावट वाली अच्छाई है, न समय का प्रभाव है और न माया का। केवल भगवान के शुद्ध भक्त ही, जिन्हें देवताओं और राक्षसों दोनों द्वारा पूजा जाता है, भगवान के सहयोगी के रूप में आध्यात्मिक दुनिया में निवास करते हैं।" (भागवतम २.९.९-१०)

इति संचिन्त्य भगवान्

महाकरुणिको हरिः

दर्शयामास लोकं स्वं

गोपानां तमसः परम

सत्यं ज्ञानम अनंतं यद्

ब्रह्म-ज्योतिः सनातनम

यद् धि पश्यन्ति मुनी

गुणापाये समाहिता

"गहनता से विचार करने के बाद, दयालु सर्वोच्च भगवान हरि ने ग्वालों को अपना निवास दिखाया जो भौतिक अंधकार से परे है। भगवान कृष्ण ने अविनाशी आध्यात्मिक तेज का खुलासा किया, जो असीमित, चेतन और शाश्वत है। मुनि उस आध्यात्मिक अस्तित्व को तल्लीनता में देखते हैं, जब उनकी चेतना भौतिक प्रकृति के तरीकों से मुक्त होती है।" (भागवतम 10.28.14-15)

अब, 14 से 19 तक के पाठों में, उत्तर इसी तरह से वैकुण्ठ के पारलौकिक अस्तित्व को सामान्य तरीके से समझाती हैं। भगवान का अवैयक्तिक तेज वैकुण्ठ के आध्यात्मिक वातावरण को धुंधला रूप से दर्शाता है, जो पूर्ण सत्य की पूर्ण अभिव्यक्ति है।

भगवान के साथ एक व्यक्तिगत संबंध फिर से स्थापित करने के बाद, शुद्ध वैष्णव वैकुण्ठ प्राप्त करते हैं। हालाँकि, अवैयक्तिकतावादी, सर्वोत्तम रूप से ब्रह्म-ज्योति तेज प्राप्त करते हैं, जहां वे भगवान के साथ अपने रिश्ते या उस रिश्ते में उनकी सेवा करने से आने वाले परमानंद सुख को जाने बिना अपने शाश्वत अस्तित्व का एहसास करते हैं। दूसरे शब्दों में, वैकुण्ठ वातावरण ब्रह्म-ज्योति आकाश का एक सुपर-गहन संस्करण है, और इस प्रकार वैकुण्ठ में भगवान के भक्तों द्वारा भोगा गया जीवन ब्रह्म-ज्योति में विलय होने के तुलनात्मक रूप से महत्वहीन आनंद की तुलना में बहुत अधिक अद्भुत है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)