श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 137
 
 
श्लोक  2.1.137 
नव-वैष्णव किं कर्तुं
दरिद्रः शक्नुयां परम्
अर्पयामि स्व-भोग्यं हि
जगद्-ईशाय केवलम्
 
 
अनुवाद
"हे नए वैष्णव," उन्होंने कहा, "यह बेचारा और क्या कर सकता है? मैं तो ब्रह्माण्ड के स्वामी को केवल वही भोजन अर्पित कर सकता हूँ जो मैं अपने लिए बनाता हूँ।
 
“O new Vaishnava,” he said, “what else can this poor fellow do? I can only offer to the Lord of the Universe the food I prepare for myself.
तात्पर्य
गंगा नदी के पास रहने वाले ब्राह्मण ने सोचा, "अगर यह ग्वाला लड़का मेरे जैसा ब्राह्मण शिलाग्राम शिला की पूजा करता हुआ नहीं देखा है, तो निश्चय ही वह आध्यात्मिक जीवन में नया होगा।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)