श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 136
 
 
श्लोक  2.1.136 
इत्य् अकृत्रिम-सन्तापं
विलापातुरम् अब्रवीत्
ब्राह्मणः सान्तयित्वा मां
ह्रीण-वद् विनयान्वितः
 
 
अनुवाद
जब मैं शिकायत कर रहा था और अपने स्वाभाविक विलाप में तड़प रहा था, तो ब्राह्मण ने मुझे सांत्वना देने की कोशिश की। विनम्रता से भरा हुआ, वह लज्जा से बोला।
 
While I was complaining and writhing in my natural lamentations, the Brahmin tried to console me. Full of humility, he spoke with shame.
तात्पर्य
संत ब्राह्मण इतना गरीब था कि वह किसी नर अतिथि को भी भोजन नहीं करा सकता था। परमात्मा का तो सवाल ही नहीं उठता। वास्तव में उस स्थान पर जहाँ उसने पूजा की थी, वहाँ खाना पकाने की कोई सुविधा नहीं थी। परंतु ब्राह्मण में जो ईर्ष्या थी, वह किसी बाहरी परिस्थिति से उत्पन्न नहीं थी; यह ईश्वर के प्रति उनके विशिष्ट प्रेम का सहज आनंद था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)