फिर भी, यद्यपि सकाम-भक्तों को भगवान के राज्य में प्रवेश के लिए योग्यता प्राप्त करने के लिए अतिरिक्त शुद्धि की आवश्यकता होती है, उन्हें कर्मियों और ज्ञानियों की तरह भौतिक प्रकृति के नियमों के अधीन कभी नहीं माना जाना चाहिए। जैसा कि यहाँ कहा गया है, सकाम-भक्त भौतिक बंधनों (स्वेच्छया) से मुक्त होकर इस दुनिया में खुशी से रहते हैं। उन्हें महार से शुरू होकर उच्चतम ग्रहों सहित इस दुनिया के सभी क्षेत्रों का दौरा करने की स्वतंत्रता है, वे आर्चिर-आदि मार्ग पर सूक्ष्मतम अवस्थाओं तक पहुँच सकते हैं, और वे इस ब्रह्मांड के भीतर वैकुण्ठ क्षेत्रों जैसे श्वेतद्वीप और रामाप्रिया को प्राप्त कर सकते हैं। हर भौतिक स्थिति में कमी और दुख से निराशा से बचते हुए, सकाम-भक्त इस दुनिया में खुशी पाते हैं (सुख-भोग)। श्रील सनातन गोस्वामी वर्तमान काल के रूप में "भुंजानः" ("आनंद लेते हुए") शब्द का प्रयोग यह इंगित करने के लिए करते हैं कि जब वैष्णव भौतिक दुनिया के अपने अंतिम आनंद को समाप्त कर रहे होते हैं तब भी प्रभु की भक्ति सेवा की शक्ति उन्हें इतना शुद्ध करती है कि उनके हृदय में सभी बाधाओं को ध्वस्त कर देती है। उनके भौतिक व्यवसाय समाप्त होने पर, वे तब परम प्रभु के शाश्वत निवास को प्राप्त करते हैं।
