श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  2.1.13 
भक्ता भगवतो ये तु
स-कामाः स्वेच्छयाखिलान्
भुञ्जानाः सुख-भोगांस् ते
विशुद्धा यान्ति तत्-पदम्
 
 
अनुवाद
किन्तु भगवान के भक्त भी, जिनमें अभी भी भौतिक इच्छाएँ हैं, अपनी इच्छानुसार सुख भोग सकते हैं और पूर्णतः शुद्ध होकर भगवान के धाम जा सकते हैं।
 
But even the devotees of the Lord, who still have material desires, can enjoy the pleasures they desire and go to the abode of the Lord after becoming completely purified.
तात्पर्य
वैष्णव भक्त अनासक्त परमहंसों से अधिक उन्नत होते हैं। यहाँ तक कि भौतिक इच्छाओं के बोझ तले दबा एक भक्त भी ऐसी कामनाओं से मुक्त किसी अभेदीवादी से बेहतर स्थिति में होता है। फिर भी, ठीक उसी तरह जैसे दोनों कर्मियों और ज्ञानियों को उनकी अप्रत्यक्ष इच्छाओं से उनकी सापेक्ष स्वतंत्रता के संदर्भ में प्रतिष्ठित किया जाता है, उसी तरह भक्तों को भी प्रतिष्ठित किया जाता है। अधिकांश कर्मी और ज्ञानी धीरे-धीरे ही पूर्णता तक पहुँच सकते हैं; केवल कुछ ही परमहंस-ज्ञानी तुरंत मुक्ति प्राप्त करते हैं। इसी तरह, यद्यपि सभी वैष्णव परम पूर्णता के लिए निश्चित उम्मीदवार होते हैं, सकाम-भक्त, जिनकी भगवान के व्यक्तित्व के प्रति भक्ति नियंत्रण और आनंद की इच्छाओं से मिश्रित होती है, उन्हें पहले शुद्ध होना चाहिए।

फिर भी, यद्यपि सकाम-भक्तों को भगवान के राज्य में प्रवेश के लिए योग्यता प्राप्त करने के लिए अतिरिक्त शुद्धि की आवश्यकता होती है, उन्हें कर्मियों और ज्ञानियों की तरह भौतिक प्रकृति के नियमों के अधीन कभी नहीं माना जाना चाहिए। जैसा कि यहाँ कहा गया है, सकाम-भक्त भौतिक बंधनों (स्वेच्छया) से मुक्त होकर इस दुनिया में खुशी से रहते हैं। उन्हें महार से शुरू होकर उच्चतम ग्रहों सहित इस दुनिया के सभी क्षेत्रों का दौरा करने की स्वतंत्रता है, वे आर्चिर-आदि मार्ग पर सूक्ष्मतम अवस्थाओं तक पहुँच सकते हैं, और वे इस ब्रह्मांड के भीतर वैकुण्ठ क्षेत्रों जैसे श्वेतद्वीप और रामाप्रिया को प्राप्त कर सकते हैं। हर भौतिक स्थिति में कमी और दुख से निराशा से बचते हुए, सकाम-भक्त इस दुनिया में खुशी पाते हैं (सुख-भोग)। श्रील सनातन गोस्वामी वर्तमान काल के रूप में "भुंजानः" ("आनंद लेते हुए") शब्द का प्रयोग यह इंगित करने के लिए करते हैं कि जब वैष्णव भौतिक दुनिया के अपने अंतिम आनंद को समाप्त कर रहे होते हैं तब भी प्रभु की भक्ति सेवा की शक्ति उन्हें इतना शुद्ध करती है कि उनके हृदय में सभी बाधाओं को ध्वस्त कर देती है। उनके भौतिक व्यवसाय समाप्त होने पर, वे तब परम प्रभु के शाश्वत निवास को प्राप्त करते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)