श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 121
 
 
श्लोक  2.1.121 
एवम् एतं भवन्-मन्त्रं
स्नातायोपदिदेश मे
पूर्ण-कामो ’नपेक्ष्यो ’पि
स दयालु-शिरोमणिः
 
 
अनुवाद
इस प्रकार, मेरे स्नान करने के बाद, उन्होंने मुझे वही मंत्र दिया जिसका तुम जप कर रहे हो। यद्यपि वे स्वयं में पूर्णतः संतुष्ट थे और भौतिक वस्तुओं के प्रति उदासीन थे, फिर भी वे सभी दयालु आत्माओं के शिखर रत्न थे।
 
Thus, after I had bathed, he gave me the same mantra you are chanting. Although completely content within himself and indifferent to material things, he was the crown jewel of all compassionate souls.
तात्पर्य
चूँकि गोपा-कुमार और उनके शिष्य दोनों को एक ही मंत्र दिया गया था, उनका सम्बन्ध बहुत ही मैत्रीपूर्ण होना चाहिए।

जब गोपा-कुमार को अपना मंत्र मिला होगा, उन्हें नहीं सोचना चाहिए होगा कि यह उनके गुरु द्वारा छाछ और दही के उपहार के प्रतिदान का तरीका है। उनके गुरु, जो पूर्ण रूप से आत्मसंतुष्ट थे, को उनकी सेवा की आवश्यकता नहीं थी। केवल गिरी हुई आत्माओं के लिए अनन्त करुणा के कारण ही गुरु ने गोपा-कुमार पर अपनी दया दिखाई।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)