वैश्वानरं याति विहायसा गतः
सुषुम्णया ब्रह्म-पथेन शोचिषा
विधूत-कल्कोऽथ हरेर उदस्तात्
प्रयाति चक्रं नृप शैशुमारम
"हे राजन, जब कोई रहस्यज्ञ सुषुम्णा द्वारा आलोकित होकर उच्चतम लोक ब्रह्मलोक में प्रवेश करने के लिए मंदाकिनी को पार करता है, तब सर्वप्रथम वह अग्निदेवता के लोक वैश्वानार में जाता है। वहाँ वह सभी प्रकार के दूषित पदार्थों से पूर्णतः शुद्ध हो जाता है और तत्पश्चात् और भी ऊँचे, शिशुमार चक्र में जाता है जहाँ उसकी भगवान हरि, भगवान के साथ साक्षात्कार होता है।
तद् विश्व-नाभिं त्वतिवर्त्य विष्णोर
अणीयसा विरजेनात्मनैकः
नमस्कृतं ब्रह्म-विदामुपैति
कल्पाद्युशो यद् विबुधा रमन्ते
"यह शिशुमार पूर्ण ब्रह्मांड के परिभ्रमण का ध्रुव है और इसे विष्णु की नाभि कहा जाता है [गर्भोदकशायी विष्णु]। योगी अकेला ही शिशुमार के इस चक्र से आगे जाता है और उस लोक [महर्लोक] को प्राप्त करता है जहाँ भृगु जैसे शुद्ध संतों को 4,300,000,000 सौर वर्षों का जीवनकाल प्राप्त होता है। यह लोक परात्पर संतों के लिए भी पूजनीय है।
अथो अनंतस्य मुखानलेन
दग्ध्यामानं स निरीक्ष्य विश्वं
निर्यति सिद्धेश्वर-जुष्ट-धिष्ण्यं
यद् द्वै-पारार्ध्यम तदुप परमैष्ठ्यम्
"विश्व के विनाश के समय अनंत के मुख से अग्नि की एक ज्वाला निकलती है। योगी सारे ब्रह्मांड के ग्रहों को जलती हुई राख में बदलता हुआ देखता है और इस प्रकार, महान शुद्ध आत्माओं द्वारा प्रयोग किये जाने वाले विमान द्वारा सत्यलोक के लिए प्रस्थान करता है। सत्यलोक में जीवन काल 15,480,000,000,000 वर्षों के बराबर माना जाता है।
न यत्र शोक्रो न जरा न मृत्यु
नार्तिर्न चोड्वेग ऋते कुतश्चिद
यत् चित्ततोऽदः कृपया निदां-विदां
दुरंत-दुःख-प्रभवानुदर्शनत्
"उस सत्यलोक में, न शोक है, न वृद्धावस्था है, और न ही मृत्यु है। वहाँ किसी भी प्रकार का कोई कष्ट नहीं है, और इसलिए वहाँ कोई चिंता नहीं है। पर कभी-कभी उन लोगों के लिए कुछ करुणा का भाव होता है जो भक्ति सेवा की प्रक्रिया से अनभिज्ञ हैं और जो भौतिक जगत में अत्यधिक दुखों से ग्रस्त हैं।
ततो विशेषं प्रतिपद्य निर्भयस
तेनात्मनापोऽनल-मूर्तिरत्वरन्
ज्योतिर-मयो वायुमुपेत्य काले
वाय्वात्मना खं बृहदात्म-लिङ्गम
"सत्यलोक तक पहुँचने के बाद, भक्त भौतिक शरीर जैसी पहचान में सूक्ष्म शरीर द्वारा निर्भीकता से सम्मिलित होने में विशेष रूप से सक्षम हो जाता है। और एक के बाद एक क्रमशः वह पृथ्वी तत्व से जल तत्व तक, जल तत्व से अग्नि तत्व तक, अग्नि तत्व से तेज तत्व तक और तेज तत्व से वायु तत्व तक अस्तित्व के चरणों को प्राप्त करता है, अंततः वह आकाश तत्व के स्तर पर पहुँचता है।
घ्राणेन गंधं रसनेन वै रसं
रूपं च दृष्ट्या श्वसनं त्वचैव
श्रोत्रेण चोपैत्य नभो-गुणत्वं
प्राणेन चाकूतिमुपैति योगी
"भक्त इस प्रकार विभिन्न इन्द्रियों के सूक्ष्म विषयों को पार कर लेता है, जैसे कि सूँघने से गन्ध, स्वाद से रस, देखने से रूप, छूने से स्पर्श, आकाश के पहचान से कान के कम्पन और भौतिक गतिविधियों से इन्द्रिय अंगों को।
स भूत-सूक्ष्मेन्द्रिय-सन्निकर्षं
मनो-मयं देव-मयं विकार्यम
संसाद्य गत्या सह तेन याति
विज्ञान-तत्त्वं गुण-संनिरोधम
"आवरण के स्थूल और सूक्ष्म रूपों को इस प्रकार पार करते हुए, भक्त अहंकार के तल में प्रवेश करता है। वहाँ वह प्रकृति के भौतिक गुणों [अज्ञान और राग] को तटस्थता के उस बिन्दु में विलय कर देता है और इस प्रकार सत्वगुण में स्थित हो जाता है। इसके बाद, सारा अहंकार महत्-तत्त्व में विलीन हो जाता है। और वह शुद्ध आत्मा-साक्षात्कार के बिन्दु पर आ जाता है।
तेनात्मनात्मानमुपैति शांतम्
आनंदम् आनंदमयोऽवसाने
एतां गतिं भागवतीं गतो यः
स वै पुनरनेह विषज्जतेऽंग
"केवल शुद्ध आत्मा ही भगवान के साथ पूर्ण आनंद और संतोष में अपनी वास्तविक स्थिति में मिलने की पूर्णता प्राप्त कर सकता है। जो कोई भी इस प्रकार की भक्ति पूर्णता प्राप्त करने में सक्षम हो जाता है, वह फिर कभी भौतिक संसार की ओर आकर्षित नहीं होता है, और वह कभी वापस नहीं लौटता।"
यह मुक्ति का धीरे-धीरे प्राप्त होने वाला पथ है। परमहंस, हालाँकि, अपने वर्तमान जीवन के अंत में तुरंत मुक्त हो जाते हैं।
