श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 114
 
 
श्लोक  2.1.114 
कीर्तयन्तं मुहुः कृष्णं
जप-ध्यान-रतं क्वचित्
नृत्यन्तं क्वापि गायन्तं
क्वापि हास-परं क्वचित्
 
 
अनुवाद
वह हमेशा कृष्ण की महिमा का गुणगान करता रहता था। कभी गाता, कभी नाचता। कभी ध्यान में लीन होकर मन ही मन मंत्र जपता, तो कभी हँसता रहता।
 
He was always singing the praises of Krishna. Sometimes he would sing, sometimes he would dance, sometimes he would meditate and chant mantras silently, and sometimes he would laugh.
तात्पर्य
इस ब्राह्मण की विशेषता यह थी कि वह हमेशा कृष्ण के गुणों का बखान करता था, या तो उनके दो-अक्षर नाम कृष्ण से या भगवान के दूसरे नामों से। वह इन नामों को अलग-अलग तरीके से गाते थे। कभी-कभी वह जाप और ध्यान में मग्न हो जाते थे, जिसे वह हर दिन निष्ठापूर्वक करते थे, जबकि वह भगवान के पवित्र नामों के उच्चारण में पहले से ही निपुण थे। जैसे कि तंत्र बताते हैं कि जो व्यक्ति अपने मंत्र के जाप में सिद्ध हो जाता है, उसे भी जाप और ध्यान के द्वारा अपने आध्यात्मिक गुरुओं के प्रति कृतज्ञता प्रदर्शित करते हुए नियमित पूजा करनी चाहिए:

सिद्ध-मंत्रोऽपि पूतआत्मा

त्रि-संध्यां देवमर्चेत्

नियमैका-संध्यां वा

जपेद् अष्टोत्तरं शतम्

“भले ही व्यक्ति अपने मंत्र में पूर्ण हो गया हो और उसके हृदय में पवित्रता हो, उसे फिर भी दिन के तीन संधि कालों में बताए गए तरीके से भगवान की पूजा करनी चाहिए। या कम से कम वह इन तीनों समय में से एक समय में पूजा कर सकता है और 108 बार अपने मंत्र का जाप करना चाहिए।”

वह ब्राह्मण जब अपने निर्धारित जाप और ध्यान में लीन प्रतीत होता था, तो वास्तव में उसकी बाहरी इंद्रियां निष्क्रिय होती थीं, क्योंकि वह उन्हें नहीं दबाते थे बल्कि उसमें उमड़ते हुए अगाध प्रेम के कारण होता था।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)