सिद्ध-मंत्रोऽपि पूतआत्मा
त्रि-संध्यां देवमर्चेत्
नियमैका-संध्यां वा
जपेद् अष्टोत्तरं शतम्
“भले ही व्यक्ति अपने मंत्र में पूर्ण हो गया हो और उसके हृदय में पवित्रता हो, उसे फिर भी दिन के तीन संधि कालों में बताए गए तरीके से भगवान की पूजा करनी चाहिए। या कम से कम वह इन तीनों समय में से एक समय में पूजा कर सकता है और 108 बार अपने मंत्र का जाप करना चाहिए।”
वह ब्राह्मण जब अपने निर्धारित जाप और ध्यान में लीन प्रतीत होता था, तो वास्तव में उसकी बाहरी इंद्रियां निष्क्रिय होती थीं, क्योंकि वह उन्हें नहीं दबाते थे बल्कि उसमें उमड़ते हुए अगाध प्रेम के कारण होता था।
