कर्म करने वाले जो मुक्ति की ओर अग्रसर नहीं होते, वे अस्थायी तौर पर स्वर्गीय सुखों का आनंद लेते हैं और फिर भौतिक प्रयासों के निचले स्तर पर वापस आते हैं। जैसा कि भगवद गीता (9.20-21) में श्री कृष्ण कहते हैं:
त्रय-विद्या मां सोम-पाः पूत-पापा
यज्ञैर इष्ट्वा स्वर-गतिं प्रार्थयन्ते
ते पुण्य आसाद्य सुरेन्द्र-लोकम्
अश्नन्ति दिव्यान दिव्य देव-भोगान
ते तं भुकत्वा स्वर्ग-लोकं विशालम्
क्षीणे पुण्ये मर्त्य-लोकं विशन्ति
एवं त्रयी-धर्मम् अनुप्रपन्ना
गत-आगतं काम-कामा लभन्ते
"वेदों का अध्ययन करने वाले और सोम रस पीने वाले, स्वर्गीय ग्रहों की तलाश करते हुए, मेरी अप्रत्यक्ष रूप से पूजा करते हैं। पापी प्रतिक्रियाओं से शुद्ध, वे इंद्र के पवित्र, स्वर्गीय ग्रह पर जन्म लेते हैं, जहाँ वे दिव्य आनंद का आनंद लेते हैं। जब वे इस तरह विशाल स्वर्गीय भाव की खुशी का आनंद लेते हैं और उनकी पवित्र गतिविधियों के परिणाम समाप्त हो जाते हैं, तो वे इस नश्वर ग्रह पर फिर से लौट आते हैं। इस प्रकार जो लोग तीनों वेदों के सिद्धांतों का पालन करके इंद्रिय सुख चाहते हैं, वे केवल बार-बार जन्म और मृत्यु प्राप्त करते हैं।"
ब्रह्मांड में सबसे ऊंचे ग्रहों पर मेरा उन्नयन जन्म और मृत्यु से मुक्ति का आश्वासन नहीं दे सकता। व्यक्ति को सभी भौतिक इच्छाओं को त्याग देना चाहिए। जैसा कि भगवद गीता (8.16) में श्री कृष्ण कहते हैं, आ-ब्रह्म-भुवनाल लोकाः/ पुनर-आवर्तनो अर्जुन: "भौतिक दुनिया में सबसे ऊंचे ग्रह से सबसे निचले स्तर तक, सभी दुख के स्थान हैं जहां बार-बार जन्म और मृत्यु होती है।" केवल निःस्वार्थ काम के लिए समर्पित व्यक्ति ही ब्रह्मा के साथ मुक्ति प्राप्त करने में शामिल हो सकते हैं:
ब्रह्मणा सह ते सर्वे
सम्प्राप्ते प्रतिसंचरे
परस्यंते कृत-आत्मानः
प्रविशन्ति परं पदम्
"पूरी तरह से सफल आध्यात्मवादी अंतिम विनाश के दौरान ब्रह्मा के जीवन के अंत में ब्रह्मा के साथ सर्वोच्च स्थान में प्रवेश करते हैं।"
