श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 108
 
 
श्लोक  2.1.108 
स्वयम् एव स्व-माहात्म्यं
कथ्यते यन् न तत् सताम्
सम्मतं स्यात् तथाप्य् अस्य
नान्याख्यानाद् धितं भवेत्
 
 
अनुवाद
"अपनी महिमा का वर्णन करना आध्यात्मिक अधिकारियों को नापसंद है। लेकिन मैं इसके अलावा और कुछ नहीं कह सकता जिससे उसका सौभाग्य बढ़ सके।"
 
"Spiritual authorities dislike to describe their own glory. But I cannot say anything else that would enhance his good fortune."
तात्पर्य
जैसा कि कहा जाता है कि sva-praśaṁsā dhruvo mṛtyuḥ : "आत्म प्रशंसा मृत्यु के समान है।" फिर भी, गोपा-कुमार समझता है कि केवल उसकी अपनी कहानी ही ब्राह्मण के संदेह को दूर करेगी और उसे tattva-jñāna प्रदान करेगी। क्योंकि गोपा-कुमार ने ब्राह्मण के अतीत का वर्णन करने के लिए अपनी रहस्यमय शक्ति का उपयोग किया, ब्राह्मण पहले से ही उस पर विश्वास करने के लिए इच्छुक है। इसलिए गोपा-कुमार को अपनी कहानी बताने में संकोच नहीं करना चाहिए और इस तरह ब्राह्मण को भाग्यशाली बनाना चाहिए, क्योंकि उसकी अपनी कहानी ब्राह्मण की कहानी से बहुत मिलती-जुलती है और उसके सभी संदेह दूर कर देगी। श्री राधा का आदेश तब जल्दी से पूरा किया जाएगा, और जो आमतौर पर शिष्टाचार का उल्लंघन माना जाता था वह पूरी तरह से स्वीकार्य व्यवहार होगा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)