फिर ब्राह्मण ने इतनी आध्यात्मिक उन्नति कैसे प्राप्त कर ली थी? उसने ऐसा श्रीकृष्ण की पूजा करके किया था, यद्यपि अनियमित रूप से। वह पूजा पूरी श्रद्धा और समझ के बिना कर रहा था जो केवल कृष्ण के शुद्ध भक्तों की विशेष कृपा से ही आती है। लेकिन कृष्ण के साथ कोई भी संपर्क जो सभी अस्तित्व का सर्वोच्च लक्ष्य है, पूर्ण पूर्णता का आश्वासन देता है, और ऐसा ही उनके नामों के साथ कोई भी संपर्क भी देता है, क्योंकि उनके नामों को सुनना और जपना कृष्ण-प्रेम प्राप्त करने का सर्वोच्च तरीका है। कृष्ण के नामों का अपमानजनक जप भी अगर काफी लंबे समय तक जारी रखा जाए तो व्यक्ति को अयोग्यताओं से मुक्त कर देगा, और नामभास, बिना वास्तविक लगाव के बिना आक्रामक जप, मुक्ति और पारलौकिक लगाव और स्वाद के उदय की ओर ले जाएगा।
इस प्रकार आध्यात्मिक उत्थान के लिए भगवान मदन-गोपाल के दिव्य चरण कमलों की पूजा से बेहतर कोई अभ्यास नहीं है। इस श्लोक में प्रभु के चरणों को श्रीमान के रूप में वर्णित किया गया है, यह दर्शाता है कि वे सभी प्रकार के धन और वैभव के पूर्ण रूप से स्वामी हैं। उनके पास एक भक्त की सभी हृदयस्पर्शी इच्छाओं को संतुष्ट करने और उसे उन तरीकों से प्रसन्न करने की शक्ति है जिनकी उसके जागरूक और यहां तक कि अवचेतन इच्छाओं द्वारा भी अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। इस उपासना की प्रमुख गतिविधि संकीर्तन है, मधुर गीत में प्रभु के नामों का ऊंचा स्वर से जप करना, जैसे कृष्ण, गोविंद और गोपाल।
श्री परीक्षित आगे बताते हैं कि हरि-नाम-संकीर्तन का प्रभाव वृज-भूमि के पवित्र स्थानों पर जाने से बढ़ जाता है जहाँ कृष्ण ने अपने गोपों और गोपियों के साथ पवित्र कार्यक्रम का आनंद लिया। जितना भक्ति सेवा में अन्य दायित्वों की अनुमति देती है, वैष्णवों को इन स्थानों पर भ्रमण करना चाहिए और उन्हें अपनी आँखों से देखना चाहिए। यदि वे ऐसा प्रेम और सम्मान के साथ करते हैं, तो उनका नाम-भजन शीघ्र ही फल देगा।
