श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 1: वैराग्य (त्याग)  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  2.1.10 
श्रीमद्-उत्तरोवाच
कामिनां पुण्य-कर्तॄणां
त्रै-लोक्यं गृहिणां पदम्
अगृहाणां च तस्योर्ध्वं
स्थितं लोक-चतुष्टयम्
 
 
अनुवाद
श्रीमती उत्तरा ने कहा: शुभ कर्मों का पालन करके भौतिक कामनाओं वाले गृहस्थ तीन दिव्य लोकों को प्राप्त कर सकते हैं और गृहत्यागी पुरुष इनसे भी परे चार लोकों को प्राप्त कर सकते हैं।
 
Srimati Uttara said: By performing auspicious deeds, householders with material desires can attain the three transcendental worlds, and men who have renounced their household can attain the four worlds beyond these.
तात्पर्य
उत्तरा को श्री गोपीनाथ के निजी निवास की पहचान के बारे में कुछ शंकाएं हैं, लेकिन वह समझती है कि जिन भक्तों का प्रेम गोपीनाथ के चरण कमलों पर केन्द्रित है, वे सभी लोगों से बढ़िया, सबसे श्रेष्ठ गंतव्य के पात्र हैं। अपने पुत्र को यह समझाने के लिए और अपनी पूछताछ के संदर्भ को ठीक से स्थापित करने के लिए, वह ग्यारह श्लोक (श्लोक 10 से 20) बोलती हैं, जो प्रगतिशील आत्माओं के विभिन्न गंतव्यों का वर्णन करते हैं। पहले वह 'भौतिक कार्यों' से जुड़े लोगों के उन गंतव्यों का उल्लेख करती है, जिन्हें दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है - 'लगाव वाले' और 'बिना लगाव वाले'।

"शुभ कर्म" वे हैं जो वेदों द्वारा निर्धारित किए गए हैं; उनमें नियमित दायित्वों (नित्य-कर्म) के रूप में किए जाने वाले कर्तव्य, असाधारण परिस्थितियों के लिए निर्धारित कर्तव्य (नैमित्तिक-कर्म) और व्यक्तिगत इच्छाओं की पूर्ति के लिए वैकल्पिक कार्य के रूप में किए जाने वाले कर्तव्य (काम्य-कर्म) शामिल हैं। इन भौतिक गतिविधियों के करने वाले आमतौर पर गृहस्थ-आश्रम में रहते हैं, जिनके परिवार है और जिनकी कई इच्छाएँ हैं। कार्य के फलों का आनंद लेने वाले ऐसे नियमित लोगों के गंतव्य तीन ग्रह प्रणालियों भूर्, भुवर् और स्वर्ग में हैं। उत्तर द्वारा वर्णित कर्मि साधारण आधुनिक भौतिकवादी नहीं हैं; बल्कि, ये कर्मि वेदों के शुभ अनुष्ठानिक कर्तव्यों के माध्यम से अपनी भौतिक इच्छाओं को संतुष्ट करते हैं।

संयम के बल पर, सदा ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासी चार उच्चतम भौतिक ग्रहों, महार, जनास, तपस और सत्य तक पहुँचने के योग्य हैं। जैसा कि श्री शुकदेव गोस्वामी ने श्रीमद् भागवतम (2.6.20) के दूसरे सर्ग में कहा है:

पदास् त्रयो बहिश् चासन्

अप्रजानां य आश्रमाः

अंतस् त्रि-लोक्यास् त्व अपरो

ग्रह-मेधोऽ बृहद्-व्रताः

"आध्यात्मिक संसार जो भगवान की ऊर्जा के तीन चौथाई भागों से बना है, इस भौतिक संसार से बाहर स्थित है और विशेष रूप से उन लोगों के लिए है जो कभी भी पुनर्जन्म नहीं लेंगे। अन्य, जो पारिवारिक जीवन से जुड़े हैं और जो ब्रह्मचर्य व्रत का कड़ाई से पालन नहीं करते हैं, उन्हें तीन भौतिक संसारों में रहना होगा।" दूसरे शब्दों में, जो लोग कभी भी संतान पैदा न करने की प्रतिज्ञा करते हैं, उन्हें भूर्, भुवर् और स्वर्ग तीन प्रणालियों से परे की दुनियाओं का सूक्ष्म आनंद दिया जाता है। बाकी सभी गृहस्थ जीवन में उलझे हुए हैं; वे ब्रह्मचर्य के "महाव्रत" का पालन करने के बजाय, वे सेक्स के आदी बने रहते हैं।

वे गृहस्थ जो भौतिक इच्छाओं से मुक्त हैं और जिनकी एकमात्र महत्त्वाकांक्षा अपने निर्धारित कर्तव्यों का पालन करना है, वे भी महार और उससे आगे के उच्च ग्रहों तक पहुँच सकते हैं, और जो अपनी चेतना को पर्याप्त रूप से शुद्ध करते हैं वे मुक्ति भी प्राप्त कर सकते हैं। जैसा कि भगवान रुद्र ने श्रीमद्-भागवतम (4.24.29) के चौथे सर्ग में कहते हैं:

स्व-धर्म-निष्ठः शत-जन्मभिः पुमान्

विरिंचताम् एति ततः परं हि माम्

अव्यक्तं भागवतोऽथ वैष्णवं

पदं यथाहं विभुधाः कलात्यये

"एक व्यक्ति जो अपने व्यवसायिक कर्तव्य को एक सौ जन्मों तक ठीक से निभाता है, वह ब्रह्मा के पद पर रहने के योग्य बन जाता है, और यदि वह अधिक योग्य बन जाता है तो वह मेरे पास आ सकता है। लेकिन भगवान कृष्ण या विष्णु के प्रति अविभाज्य भक्ति सेवा में सीधे समर्पित व्यक्ति को एक बार में ही आध्यात्मिक ग्रहों पर पदोन्नत कर दिया जाता है। मैं और दूसरे देवता भौतिक दुनिया के नष्ट होने के बाद उन ग्रहों पर पहुँचते हैं।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)