श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 7: पूर्ण (उत्कृष्ट भक्तों का शिखर)  »  श्लोक 98
 
 
श्लोक  1.7.98 
तमिस्र-पुञ्जादि यद् एव किञ्चिन्
मदीय-वर्णोपमम् ईक्ष्यते तैः
स-चुम्बनं तत् परिरभ्यते मद्-
धिया परं तत् क्व नु वर्णनीयम्
 
 
अनुवाद
अगर उन्हें मेरे रंग जैसा कोई अंधकार का धब्बा दिखाई दे, तो वे उसे ही मेरा समझकर गले लगा लेते हैं और चूम लेते हैं। मैं इससे ज़्यादा क्या बताऊँ?
 
If they see a speck of darkness that resembles my complexion, they embrace and kiss it, assuming it's mine. What more can I say?
तात्पर्य
जब वृंदावन के भक्त विशेष रूप से युवा गोपियाँ, एक छाया या एक अंधेरी जगह देखते हैं जो उन्हें कृष्ण के निर्मल गहरे नीले रंग की याद दिलाती है, तो उन्हें लगता है कि कृष्ण उनके सामने खड़े हैं। छाया को चूमने और गले लगाने की कोशिश करने के अलावा वे और क्या करते हैं, कृष्ण इसका वर्णन इसलिए नहीं करना चाहेंगे, क्योंकि उनके कुछ श्रोता समझने के अयोग्य हो सकते हैं और अन्य संकट में पड़ सकते हैं। भले ही वह अपने भक्तों के पास वृंदावन लौट आते और अपनी उपस्थिति से उन्हें कृपा करते, लेकिन वह उन्हें सुख और उत्साह देने में असमर्थ होते। और यहाँ तक कि उनकी अनुपस्थिति में भी व्रजवासी कभी-कभी अपने मन में उनकी आध्यात्मिक छवियों की कल्पना करके उनकी उपस्थिति का आनंद लेते हैं। तो कृष्ण को लगता है कि वह उनकी स्थिति को बदलने के लिए कुछ नहीं कर सकते और एक दिवालिया ऋणी बने रहना चाहिए, जैसा कि उन्होंने पहले वर्णन किया था। उन्हें कृतघ्न नहीं कहा जाना चाहिए, क्योंकि परिस्थितियाँ उन्हें असहाय बना देती हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)