श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 7: पूर्ण (उत्कृष्ट भक्तों का शिखर)  »  श्लोक 97
 
 
श्लोक  1.7.97 
अदृश्यमाने च मयि प्रदीप्त-
वियोग-वह्नेर् विकलाः कदाचित्
मृता इवोन्माद-हताः कदाचिद्
विचित्र-भावं मधुरं भजन्ते
 
 
अनुवाद
और जब वे मुझे देख नहीं पाते, तो वे इतने विक्षुब्ध हो जाते हैं कि विरह की अग्नि उन्हें कभी मृत और कभी विक्षिप्त बना देती है। इस प्रकार वे अद्भुत आनंद के अमृत का पान करते हैं।
 
And when they cannot see me, they become so distraught that the fire of separation sometimes leaves them dead and sometimes insane. Thus they drink the nectar of wonderful bliss.
तात्पर्य
इस श्लोक में कृष्ण स्वयं पर लगे इस आरोप का खंडन करते हैं कि वह कृतघ्न हैं और इसलिए उन्होंने व्रजवासियों का त्याग किया। कृष्ण की अनुपस्थिति के कारण व्रजवासियों को जो पीड़ा हो रही है, वह आग की तपिश के समान ही केंद्रित है। वे अपने होश खो देते हैं और कभी-कभी मृत्यु के कगार पर पहुँचे हुए दिखते है। जीवन के बाहरी चिन्ह भी उनमें नहीं दिखाई देते हैं। अन्य समय में वे पागलपन से ग्रस्त प्रतीत होते हैं। लेकिन कृष्ण बताते हैं कि ये सभी उच्चतम भक्ति परमानंद के प्रतीक हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)