श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 7: पूर्ण (उत्कृष्ट भक्तों का शिखर)  »  श्लोक 89
 
 
श्लोक  1.7.89 
स्तम्भे ’न्तर्धाप्य देहं स्वं
स्थिता लज्जा-भयान्विता
संलक्ष्य प्रभुणा प्रोक्ता
संरम्भावेशतः स्फुटम्
 
 
अनुवाद
वह एक खंभे के पीछे छिप गई और शर्म और भय से भरकर वहीं खड़ी हो गई। कृष्ण ने उसे देखा और क्रोधित होकर उससे स्पष्ट स्वर में बोले।
 
She hid behind a pillar and stood there, filled with shame and fear. Krishna saw her and, angrily speaking to her in a clear voice.
तात्पर्य
हालाँकि सत्यभामा स्वयं को इस प्रकार छिपाती थी कि कृष्ण उन्हें न देख सकें, लेकिन उन्होंने उनकी अनूठी सुगंध को सूँघ लिया और उनकी उपस्थिति के अन्य सूक्ष्म संकेतों को देखा। सत्यभामा को अक्सर ईर्ष्या के दौरे पड़ते थे, लेकिन अब वह डर गई थी कि अनुचित समय पर अपना गुस्सा दिखाने से वह बहुत आगे निकल गई है। सर्वोच्च भगवान की सेवा कभी भी संयोग से नहीं करनी चाहिए, बल्कि हमेशा सावधानीपूर्वक ध्यान देते हुए, उनकी इच्छानुसार और जिस समय वे चाहें, उन्हें संतुष्ट करने के लिए करनी चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)