वियोगिनीनां अपि पद्वतिम वो
ना योगिनो गंतुम् अत्र क्षमते
यद् ध्येयरूपस्य परस्य पुंसो
यूयं गता ध्येयपदं दुरापम
"तुमने अपनी वियोग भावना में एक ऐसा पथ अपनाया है जिस पर बड़े-बड़े योगी भी चलना तो दूर की बात है, सोच भी नहीं सकते। तुमने परम पुरुष को अपने ध्यान का केन्द्र बनाया है, जबकि अन्य साधक केवल अत्यधिक कठिनाई से उस पर अपना ध्यान केन्द्रित कर पाते हैं।"
