श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 7: पूर्ण (उत्कृष्ट भक्तों का शिखर)  »  श्लोक 67
 
 
श्लोक  1.7.67 
ततो ह्रीण इव ज्येष्ठ-
मुखं पश्यन् स्मितं श्रितः
रामेणोद्वर्त्य तत्राब्धौ
स्नापितो धूलि-धूसरः
 
 
अनुवाद
तब कृष्ण ने अपने भाई के चेहरे की ओर देखा और शर्मिंदा होकर मुस्कुराए। चूँकि कृष्ण का शरीर धूल से ढका हुआ था, बलराम ने उन्हें पोंछकर समुद्र में स्नान कराया।
 
Then Krishna looked at his brother's face and smiled embarrassedly. Since Krishna's body was covered with dust, Balarama wiped him dry and bathed him in the ocean.
तात्पर्य
जैसा कि शब्द इवा से संकेतित किया गया है, कृष्ण के पास शर्मिंदा होने का कोई कारण नहीं था। उनका व्यवहार हमेशा पूरी तरह से प्रशंसनीय रहा था। उद्धव के प्रति कृष्ण के अपने शब्दों में, जुगुप्सा ह्रीर अकरमसु: "वास्तविक नम्रता का अर्थ है अनुचित कार्यों से घृणा करना। " (भागवतम 11.19.40) यदि कोई व्यक्ति अवैध कार्यों में लिप्त है, तो उसे शर्म आनी चाहिए और अपने गलत व्यवहार की निंदा करनी चाहिए। लेकिन कृष्ण को कोई शर्म नहीं आई; उन्होंने बस बलराम को देखा और मुस्कुरा दिए।

बलराम ने कृष्ण के शरीर से धूल पोंछने का ख्याल रखा, धूल जो संभवतः तब लगी थी जब कृष्ण निर्मित वृंदावन में गायों को चरा रहे थे या इससे पहले, जब कृष्ण अपने अनियंत्रित उन्माद में महल के अंदर इधर-उधर लोट रहे थे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)