इससे पहले कृष्ण के मनोरंजन में, ब्रह्मा ने व्रज-भूमि का दौरा किया था और कृष्ण और उनके शुद्ध भक्तों के बीच की अद्भुतीय रिश्तों में कृष्ण के सच्चे गौरव की खोज की थी। अब, द्वारका में, ब्रह्मा को और अधिक बोध दिया जा रहा है: वह सीख रहा है कि कृष्ण के सबसे अद्भुत गुण अपने भक्तों के लिए उनकी चिंता और उनके नियंत्रण के लिए उनका समर्पण है। इसे महसूस करते हुए, ब्रह्मा अब कृष्ण की पहचान को मूल परम भगवान, नारायण के रूप में और अधिक पूरी तरह से समझ सकते हैं। ब्रह्मा पहले इन मामलों से अनजान नहीं थे, लेकिन एक असहाय अवस्था में अपने स्वयं के पूर्वजों को देखकर, जिन्होंने उन्हें वेद पढ़ाए थे, ब्रह्मा को एक गहन एहसास हुआ। जब ब्रह्मा ने कृष्ण को संकट में देखा, तो वह स्वयं मदद नहीं कर सके, लेकिन रो पड़े।
