श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 7: पूर्ण (उत्कृष्ट भक्तों का शिखर)  »  श्लोक 158
 
 
श्लोक  1.7.158 
गोपीनां वितताद्भुत-स्फुटतर-प्रेमानलार्चिश्-छटा-
दग्धानां किल नाम-कीर्तन-कृतात् तासां विशेषात् स्मृतेः
तत्-तीक्ष्ण-ज्वलनोच्छिखाग्र-कणिका-स्पर्शेन सद्यो महा-
वैकल्यं स भजन् कदापि न मुखे नामानि कर्तुं प्रभुः
 
 
अनुवाद
गोपियाँ कृष्ण-प्रेम की अद्भुत प्रज्वलित अग्नि की विशाल लपटों में भस्म हो गईं। यदि मेरे गुरु इन गोपियों के नामों का उच्चारण करते हैं और किसी गोपी के विशिष्ट गुणों का स्मरण करते हैं, तो वे भी इस प्रचंड अग्नि की लपटों से निकलती चिंगारियाँ से प्रभावित होकर, तुरन्त ही अत्यधिक व्याकुल हो जाते हैं। इसलिए उन्हें गोपियों के नामों का उच्चारण करने से बचना चाहिए।
 
The gopis were consumed in the immense flames of the wondrous fire of Krishna's love. If my guru pronounces the names of these gopis and recalls the special qualities of any gopi, he too, affected by the sparks emanating from this raging flame, immediately becomes extremely distressed. Therefore, he should refrain from pronouncing the names of the gopis.
तात्पर्य
गोपियों का कृष्ण के लिए प्रेम अद्वितीय है। यह तीव्र आनंद की चरम सीमा तक पहुंच जाता है, और इसलिए इसकी तुलना प्रज्वलित अग्नि से की जा सकती है। अपने जीवन में गोपियाँ जो कुछ भी अनुभव करती हैं, वह उनके कृष्ण-प्रेम के प्रकाश से जगमगाता है, और उनके प्रेम की ज्वाला दिलों को जला देती है, जैसे व्यक्ति के बहुत पास आने पर आग उसे जला देती है। शुकदेव गोस्वामी गोपियों के भाव से पूरी तरह तादात्म्य कर लेते हैं, और इसलिए वे भी अत्यधिक उल्लसित हो जाने के खतरे से अछूते नहीं रहते हैं। विरह-भाव की लाचार अवस्था में, वह कभी-कभी भगवान का गुणगान करते हुए मंत्रमुग्ध हो सकते हैं, जो उनकी अपनी विशेषता है और उनकी जीवन शक्ति का एकमात्र आधार है। अगर शुकदेव गोपियों के किसी भी नाम का उच्चारण करते हैं तो उनका हृदय तुरंत गोपियों के स्मरण से भर जाता है, और विरह-भाव की तेज ज्वाला उन्हें अपनी सेवा पर ध्यान केंद्रित करने में असमर्थ बना देती है। इसलिए, महाराज परीक्षित को श्रीमद-भागवतम का पाठ कराते समय वह गोपियों के नाम का उल्लेख करने से बचते थे।

भागवतम के दसवें सर्ग में कई बार, शुकदेव गतिविधियों और आनंद की बात करते हैं-लेकिन नामों की नहीं-व्यक्तिगत गोपियों की:

दुहन्त्योऽभिययुः काश्चिद्

दोहम हित्वा समुतसुकाः

पयोऽधिश्रित्य संयावम्

अनुद्वास्यापरा ययुः

"कृष्ण की बाँसुरी सुनते ही गोपियों में से कुछ गायों को दुह रही थीं। उन्होंने दूध दुहना बंद कर दिया और उनसे मिलने के लिए निकल पड़ीं। कुछ ने चूल्हे पर दूध को जमने के लिए छोड़ दिया, और कुछ ने ओवन में केक जलने के लिए छोड़ दिया।" (भागवतम 10.29.5)

कस्याश्चित्पूतनायन्त्याः

कृष्णायन्त्यपिबत्स्तनम्

टोकायित्वा रुदन्त्यन्या

पादाहन शकटायतीम्

"एक गोपी ने पूतना की नकल की, जबकि दूसरी ने शिशु कृष्ण की तरह काम किया और उसके स्तन को चूसने का नाटक किया। एक और गोपी, शिशु कृष्ण की नकल में रोते हुए, उस गोपी को लात मारी जो गाड़ी दानव, शकटासुर की भूमिका निभा रही थी।" (भागवतम 10.30.15)

तैस्तैः पदैस्तत्पदवीम्

अन्विच्छन्तोऽग्रतोऽबलाः

वध्वः पदैः सुप्रक्तानी

विलोक्यार्ताः समब्रुवन्

"गोपियाँ कृष्ण के मार्ग का अनुसरण करने लगीं, जैसा कि उनके कई पदचिन्हों से पता चलता है, लेकिन जब उन्होंने देखा कि ये निशान उनके सबसे प्रिय साथी के निशानों के साथ मिल गए हैं, तो वे परेशान हो गईं और बोलीं।" (भागवतम 10.30.26)

इत्येवं दर्शयन्त्यस्ताश्

चेरुर्गोप्यो विचेतसः

यां गोपीमनायत्कृष्णो

विहायान्याः स्त्रियो वने

सा च मेने तदाऽऽत्मानं

वरिष्ठं सर्वयोषिताम्

हित्वा गोपीः कामयाना

मामसौ भजते प्रियः

"जैसे-जैसे गोपियाँ घूमती रहीं, उनके मन पूरी तरह से विचलित हो गए, उन्होंने कृष्ण के मनोरंजन के विभिन्न संकेतों की ओर इशारा किया। जिस विशेष गोपी को कृष्ण ने एकांत जंगल में ले गए थे, जब उन्होंने अन्य सभी युवतियों को छोड़ दिया था, वह अपने आप को श्रेष्ठ महिला मानने लगी। 'मेरे प्रिय ने अन्य सभी गोपियों को अस्वीकार कर दिया है,' उसने सोचा, 'भले ही वे स्वयं कामदेव द्वारा प्रेरित हों। कृष्ण ने केवल मुझसे प्रेम करने का फैसला किया है।' " (भागवतम 10.30.35-36)

ततो गत्वा वनोद्देशं

दृप्ता केशवं अब्रवीत्

न पारयेऽहं चलितुं

नय माम यत्र ते मनः

एवं उक्तः प्रियामाह

स्कन्द आरुह्यतामिति

ततश्चान्तर्दधे कृष्णः

सा वधूरन्वतप्यत

"जैसे ही दो प्रेमी वृंदावन वन के एक हिस्से से गुजरे, विशेष गोपी को अपने ऊपर गर्व होने लगा। उसने भगवान केशव से कहा, 'मैं इससे आगे नहीं चल सकती। कृपया मुझे जहाँ चाहो वहाँ ले चलो।' इस प्रकार, संबोधित होकर, भगवान कृष्ण ने उत्तर दिया, 'बस मेरे कंधे पर चढ़ जाओ।' लेकिन जैसे ही उन्होंने यह कहा, वह गायब हो गए। तब उसकी प्रिय पत्नी को तुरंत बहुत पश्चाताप हुआ।" (भागवतम 10.30.37-38)

काचित्करम्बुजं शौरेश्

जग्रहेऽञ्जलिना मुदा

काचिद्दधार तद्बाहुं

अंसे चन्दनभूषितम्

"एक गोपी ने खुशी से अपने हाथों से कृष्ण का हाथ थाम लिया, और दूसरी ने चंदन के लेप से उपचारित उनके हाथ को अपने कंधे पर रखा।" (भागवतम 10.32.4)

काचित्समं मुकुन्देन

स्वरजातिरमिश्रिताः

उन्निNye पूजिता तेन

प्रियता साधु साध्विति

तदेव ध्रुवं उन्निNye

तस्यै मानं च बह्वदात्

"एक गोपी, भगवान मुकुंद के साथ उनके गायन में शामिल हुई, जो शुद्ध मधुर स्वर गाती थी जो उनके ऊपर सामंजस्यपूर्ण रूप से उठती थी। कृष्ण प्रसन्न हुए और उनके प्रदर्शन की बहुत सराहना की, उन्होंने कहा 'बहुत अच्छा! बहुत अच्छा!' फिर एक अन्य गोपी ने उसी राग को दोहराया, लेकिन एक विशेष ताल पैटर्न में, और कृष्ण ने उनकी भी प्रशंसा की।" (भागवतम 10.33.9)

काश्चित्तत्कृतहृत्तप-

श्वासम्लानमुखश्रियाः

श्रंसद्दुकूलवलया-

केशग्रन्थ्यश्च काश्चन

"कुछ गोपियाँ अपने दिल में इतना दर्द महसूस करती थीं कि उनकी साँसों की वजह से उनके चेहरे पीले पड़ गए। दूसरों को इतनी पीड़ा होती थी कि उनके कपड़े, कंगन और चोटियाँ ढीली हो जाती थीं।" (भागवतम 10.39.14)

काचिन्मधुकरं वीक्ष्य

ध्यायन्ती कृष्णसंगमम्

प्रियप्रस्थापितं दूतम

कल्पयित्वेदमब्रवीत्

"कृष्ण के साथ अपने पिछले जुड़ाव पर ध्यान करते हुए, गोपियों में से एक ने अपने सामने एक मधुमक्खी देखी और कल्पना की कि यह उसके प्रेमी द्वारा भेजा गया एक दूत है। इस प्रकार उसने मधुमक्खी से बात की।" (भागवतम 10.47.11)

कोई यह अनुमान लगा सकता है कि गोपियों के प्रति सम्मानजनक सम्मान शुकादेव के नामों को न बोलने का कारण था, लेकिन परीक्षित ने यहां यह निर्दिष्ट करके इसका खंडन किया कि शुकादेव कृष्ण-रसावीष्ट थे, जो हमेशा कृष्ण चेतना के सहज आनंद से मत्त थे। यह शर्म के कारण नहीं था कि शुकादेव नाम से गोपियों का उल्लेख करने से हिचकिचाते थे; यह खुद पर से नियंत्रण खोने के डर से था।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)