भागवतम के दसवें सर्ग में कई बार, शुकदेव गतिविधियों और आनंद की बात करते हैं-लेकिन नामों की नहीं-व्यक्तिगत गोपियों की:
दुहन्त्योऽभिययुः काश्चिद्
दोहम हित्वा समुतसुकाः
पयोऽधिश्रित्य संयावम्
अनुद्वास्यापरा ययुः
"कृष्ण की बाँसुरी सुनते ही गोपियों में से कुछ गायों को दुह रही थीं। उन्होंने दूध दुहना बंद कर दिया और उनसे मिलने के लिए निकल पड़ीं। कुछ ने चूल्हे पर दूध को जमने के लिए छोड़ दिया, और कुछ ने ओवन में केक जलने के लिए छोड़ दिया।" (भागवतम 10.29.5)
कस्याश्चित्पूतनायन्त्याः
कृष्णायन्त्यपिबत्स्तनम्
टोकायित्वा रुदन्त्यन्या
पादाहन शकटायतीम्
"एक गोपी ने पूतना की नकल की, जबकि दूसरी ने शिशु कृष्ण की तरह काम किया और उसके स्तन को चूसने का नाटक किया। एक और गोपी, शिशु कृष्ण की नकल में रोते हुए, उस गोपी को लात मारी जो गाड़ी दानव, शकटासुर की भूमिका निभा रही थी।" (भागवतम 10.30.15)
तैस्तैः पदैस्तत्पदवीम्
अन्विच्छन्तोऽग्रतोऽबलाः
वध्वः पदैः सुप्रक्तानी
विलोक्यार्ताः समब्रुवन्
"गोपियाँ कृष्ण के मार्ग का अनुसरण करने लगीं, जैसा कि उनके कई पदचिन्हों से पता चलता है, लेकिन जब उन्होंने देखा कि ये निशान उनके सबसे प्रिय साथी के निशानों के साथ मिल गए हैं, तो वे परेशान हो गईं और बोलीं।" (भागवतम 10.30.26)
इत्येवं दर्शयन्त्यस्ताश्
चेरुर्गोप्यो विचेतसः
यां गोपीमनायत्कृष्णो
विहायान्याः स्त्रियो वने
सा च मेने तदाऽऽत्मानं
वरिष्ठं सर्वयोषिताम्
हित्वा गोपीः कामयाना
मामसौ भजते प्रियः
"जैसे-जैसे गोपियाँ घूमती रहीं, उनके मन पूरी तरह से विचलित हो गए, उन्होंने कृष्ण के मनोरंजन के विभिन्न संकेतों की ओर इशारा किया। जिस विशेष गोपी को कृष्ण ने एकांत जंगल में ले गए थे, जब उन्होंने अन्य सभी युवतियों को छोड़ दिया था, वह अपने आप को श्रेष्ठ महिला मानने लगी। 'मेरे प्रिय ने अन्य सभी गोपियों को अस्वीकार कर दिया है,' उसने सोचा, 'भले ही वे स्वयं कामदेव द्वारा प्रेरित हों। कृष्ण ने केवल मुझसे प्रेम करने का फैसला किया है।' " (भागवतम 10.30.35-36)
ततो गत्वा वनोद्देशं
दृप्ता केशवं अब्रवीत्
न पारयेऽहं चलितुं
नय माम यत्र ते मनः
एवं उक्तः प्रियामाह
स्कन्द आरुह्यतामिति
ततश्चान्तर्दधे कृष्णः
सा वधूरन्वतप्यत
"जैसे ही दो प्रेमी वृंदावन वन के एक हिस्से से गुजरे, विशेष गोपी को अपने ऊपर गर्व होने लगा। उसने भगवान केशव से कहा, 'मैं इससे आगे नहीं चल सकती। कृपया मुझे जहाँ चाहो वहाँ ले चलो।' इस प्रकार, संबोधित होकर, भगवान कृष्ण ने उत्तर दिया, 'बस मेरे कंधे पर चढ़ जाओ।' लेकिन जैसे ही उन्होंने यह कहा, वह गायब हो गए। तब उसकी प्रिय पत्नी को तुरंत बहुत पश्चाताप हुआ।" (भागवतम 10.30.37-38)
काचित्करम्बुजं शौरेश्
जग्रहेऽञ्जलिना मुदा
काचिद्दधार तद्बाहुं
अंसे चन्दनभूषितम्
"एक गोपी ने खुशी से अपने हाथों से कृष्ण का हाथ थाम लिया, और दूसरी ने चंदन के लेप से उपचारित उनके हाथ को अपने कंधे पर रखा।" (भागवतम 10.32.4)
काचित्समं मुकुन्देन
स्वरजातिरमिश्रिताः
उन्निNye पूजिता तेन
प्रियता साधु साध्विति
तदेव ध्रुवं उन्निNye
तस्यै मानं च बह्वदात्
"एक गोपी, भगवान मुकुंद के साथ उनके गायन में शामिल हुई, जो शुद्ध मधुर स्वर गाती थी जो उनके ऊपर सामंजस्यपूर्ण रूप से उठती थी। कृष्ण प्रसन्न हुए और उनके प्रदर्शन की बहुत सराहना की, उन्होंने कहा 'बहुत अच्छा! बहुत अच्छा!' फिर एक अन्य गोपी ने उसी राग को दोहराया, लेकिन एक विशेष ताल पैटर्न में, और कृष्ण ने उनकी भी प्रशंसा की।" (भागवतम 10.33.9)
काश्चित्तत्कृतहृत्तप-
श्वासम्लानमुखश्रियाः
श्रंसद्दुकूलवलया-
केशग्रन्थ्यश्च काश्चन
"कुछ गोपियाँ अपने दिल में इतना दर्द महसूस करती थीं कि उनकी साँसों की वजह से उनके चेहरे पीले पड़ गए। दूसरों को इतनी पीड़ा होती थी कि उनके कपड़े, कंगन और चोटियाँ ढीली हो जाती थीं।" (भागवतम 10.39.14)
काचिन्मधुकरं वीक्ष्य
ध्यायन्ती कृष्णसंगमम्
प्रियप्रस्थापितं दूतम
कल्पयित्वेदमब्रवीत्
"कृष्ण के साथ अपने पिछले जुड़ाव पर ध्यान करते हुए, गोपियों में से एक ने अपने सामने एक मधुमक्खी देखी और कल्पना की कि यह उसके प्रेमी द्वारा भेजा गया एक दूत है। इस प्रकार उसने मधुमक्खी से बात की।" (भागवतम 10.47.11)
कोई यह अनुमान लगा सकता है कि गोपियों के प्रति सम्मानजनक सम्मान शुकादेव के नामों को न बोलने का कारण था, लेकिन परीक्षित ने यहां यह निर्दिष्ट करके इसका खंडन किया कि शुकादेव कृष्ण-रसावीष्ट थे, जो हमेशा कृष्ण चेतना के सहज आनंद से मत्त थे। यह शर्म के कारण नहीं था कि शुकादेव नाम से गोपियों का उल्लेख करने से हिचकिचाते थे; यह खुद पर से नियंत्रण खोने के डर से था।
