श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 7: पूर्ण (उत्कृष्ट भक्तों का शिखर)  »  श्लोक 145
 
 
श्लोक  1.7.145 
श्री-परीक्षिद् उवाच
ततः श्री-हस्त-कमलं
प्रसार्य परमादरात्
एवम् अस्त्व् इति सानन्दं
गोपी-नाथेन भाषितम्
 
 
अनुवाद
श्री परीक्षित बोले: तब भगवान गोपीनाथ ने अपना दिव्य करकमल आगे बढ़ाया और नारद के प्रति अत्यन्त आदरपूर्वक प्रसन्नतापूर्वक कहा, "ऐसा ही हो।"
 
Sri Parikshit said: Then Lord Gopinath extended His divine lotus hand and said to Narada with great respect and happiness, "So be it."
तात्पर्य
कृष्‍ण ने अपना दाहिना हाथ बढ़ा दिया, वह हाथ जिसका प्रयोग सामान्यतया आशीर्वाद देने के लिए किया जाता है। नारद कृष्‍ण से स्पष्ट प्रमाण चाहते थे इसलिए कृष्‍ण ने अपनी सहमति ऐसे तरीके से दिखायी कि कोई भी इसे समझने में विफल नहीं हो सके। जब कृष्‍ण गोपियों के प्रेमी गोपीनाथ के रूप में अपने मनोरंजनों का आनंद लेते हैं तो वह अपने हृदय की सबसे गुप्‍त इच्‍छाओं को प्रकट करते हैं और गोपीनाथ के जैसे ही इसी भाव में उन्‍होंने नारद के दो अनुरोधों को सहर्ष स्‍वीकार कर लिया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)