श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 7: पूर्ण (उत्कृष्ट भक्तों का शिखर)  »  श्लोक 111-112
 
 
श्लोक  1.7.111-112 
आकाश-याना विधि-रुद्र-शक्राः
सिद्धाः शशी देव-गणास् तथान्ये
गावो वृषा वत्स-गणा मृगाश् च
वृक्षाः खगा गुल्म-लतास् तृणानि

नद्यो ’थ मेघाः स-चराः स्थिराश् च
सचेतनाचेतनकाः प्रपञ्चाः
प्रेम-प्रवाहोत्थ-विकार-रुद्धाः
स्व-स्व-स्वभावात् परिवृत्तिम् आपुः
 
 
अनुवाद
ब्रह्मा, रुद्र, इंद्र, चंद्र, सिद्ध और आकाश में विचरण करने वाले अन्य देवता प्रेम की उस परमानंद धारा द्वारा उत्पन्न परिवर्तनों से अभिभूत हो गए। गाय, बैल, बछड़े, जंगली जानवर, वृक्ष, पक्षी, झाड़ियाँ, लताएँ और घास भी अभिभूत हो गए। नदियाँ, बादल और अन्य सभी प्राणी, चर-अचर, सजीव-जड़, सभी अभिभूत हो गए। उनमें से प्रत्येक में एक परिवर्तन आया जिससे उनका अपना स्वभाव बिल्कुल विपरीत स्वभाव में बदल गया।
 
Brahma, Rudra, Indra, Chandra, Siddha, and other celestial deities were overwhelmed by the transformations wrought by that ecstatic flow of love. Cows, bulls, calves, wild animals, trees, birds, bushes, creepers, and grasses were also overwhelmed. Rivers, clouds, and all other creatures, animate and inanimate, living and non-living, were overwhelmed. Each of them underwent a transformation that transformed their own nature into its diametrically opposite nature.
तात्पर्य
देवताओं से लेकर घास के तिनके तक, वृंदावन में कृष्ण के लीला के दर्शन के लिए उपस्थित हर जीव आनंदपूर्वक परिवर्तित हो गया। यहां तक की निर्जीव वस्तुओं ने भी चेतना प्राप्त की और प्रेम भक्ति के इन प्रभावों को समझा। वृंदावन के ऊपर आकाश में, स्वर्गीय व्यक्ति अक्सर यह देखने के लिए एकत्रित होते थे की क्या हो रहा है, जिसमें न केवल मुख्य देवता बल्कि संत, गंधर्व और विद्याधर भी शामिल थे। वे और व्रज-धाम के निवासी प्रेम की निरंतर बाढ़ से इतने अधिक प्रभावित थे कि उनके स्वभाव बदल गए। जो लोग स्वर्ग में रहने के आदी थे, वे पृथ्वी पर आने के लिए आकर्षित हुए। ब्रह्मा और अन्य प्रमुख देवता, ज्ञान के सभी क्षेत्रों में सबसे बुद्धिमान और सबसे प्रतिष्ठित अधिकारी, अपनी विवेक शक्ति खो बैठे और साधारण मूर्खों की तरह बन गए। और जो गाय और अन्य जानवर आमतौर पर खेतों में घूमते थे, वे समाधि प्राप्त करते दिखाई दिए, जो कि रहस्यमय ज्ञान की पराकाष्ठा है। वे जानवर स्थिर पौधों की तरह खड़े रहते थे, जबकि वास्तविक पौधे- पेड़, झाड़ियाँ और लताएँ—जानवरों की तरह बन गए थे, कांपते हुए और इधर-उधर घूमते हुए। निर्जीव नदियाँ और झीलें मानो जीवित हो गई हों, परमानंद से लबालब भरी हुई थीं; वे कभी-कभी अपनी धाराओं को पूरी तरह से रोक देते थे और कभी-कभी बेतहाशा बहते थे। और आकाश में हवा से उड़ने वाले बादल एक ही जगह तय हो जाते थे, छाते की भूमिका निभाते हुए कृष्ण और उनके भक्तों को सूर्य से छाया करते थे।

ये चमत्कार श्रीमद-भागवतम, दसवें कांड में वर्णित किए गए हैं:

विविधा-गोपा-चरणेषु विदग्धो

वेणु-वाद्या उरुधा निजा-शिक्षाः

तव सुतः सति यदाधरा-बिम्बे

दत्त-वेणुर अनयत् स्वर-जातीः

सवनशस तद उपधार्य सुरेशाः

शक्र-शर्व-परमेष्ठि-पुरोगाः

कवया आनत-कंधर-चित्ताः

कश्मलं ययुः अनिश्चित-तत्त्वाः

"हे पवित्र माता यशोदा, तुम्हारा पुत्र, जो गायों को पालने की सभी कलाओं में निपुण है, ने बाँसुरी बजाने की कई नई शैलियों का आविष्कार किया है। जब वे अपनी बाँसुरी अपने बिम्बा-लाल होंठों पर ले जाते हैं और सामंजस्यपूर्ण धुनों में हार्मोनिक पैमाने के स्वर भेजते हैं, ब्रह्मा, शिव, इंद्र और अन्य मुख्य देवता उस ध्वनि को सुनकर भ्रमित हो जाते हैं। यद्यपि वे सबसे अधिक विद्वान अधिकारी हैं, वे उस संगीत के सार का पता नहीं लगा सकते हैं, और इसलिए वे अपने सिर और हृदय झुकाते हैं।" (भागवतम् 10.35.14-15)

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)