रूपेण वेषेण रवामृतेन
वंश्याश् च पूर्वानुदितेन विश्वम्
सम्मोहितं प्रेम-भरेण कृत्स्नं
तिष्ठन्तु दूरे व्रज-वासिनस् ते
अनुवाद
मेरा सुन्दर रूप, मेरा वस्त्र और मेरी अपूर्व अनसुनी बांसुरी की अमृतमय ध्वनि ने समस्त ब्रह्माण्ड को भगवान के अगाध प्रेम से मोहित कर लिया। तो फिर व्रजवासियों पर इनका क्या प्रभाव पड़ा, इसका तो कहना ही क्या।
My beautiful form, my attire, and the nectar-like sound of my unique and unheard flute captivated the entire universe with immense love for the Lord. What effect did they have on the people of Vraja? What can be said about them?
तात्पर्य
कृष्ण का सौंदर्य कभी नहीं घटता, यहाँ तक कि जब उन्होंने वृन्दावन छोड़कर सौ से अधिक वर्षों तक कहीं और निवास किया। केवल स्मृति के नजरिये से कृष्ण सोचते हैं कि वे अपने युवावस्था में अधिक सुंदर थे। लेकिन वृन्दावन के विशेष मधुर भाव के कारण, जो कि कृष्ण और उनके भक्तों के बीच सहज आकर्षण से निर्मित हुआ, वहां - और कहीं नहीं - कृष्ण कुछ विशेष वस्तुओं को अपने बाहरी रूप में जोड़ने के लिए स्वतंत्र महसूस करते हैं, जैसे कि उनके बालों में मोर पंख। और केवल वृन्दावन में ही कृष्ण अपनी बाँसुरी बजाते हैं। इस प्रकार, कृष्ण का प्राकृतिक आकर्षण पूरी दुनिया को आकर्षित करता है, एक दिव्य स्वाद का सृजन करता है जो सभी प्रकार के भौतिक आनंद को परास्त करता है और ब्रह्मानंद नामक अवैयक्तिक सुख से लाखों गुना अधिक मनभावन है। ब्रह्मांड में हर कोई श्रीमद्-भागवतम जैसे ग्रंथों से इसके बारे में सुनकर, जो शुद्ध वैष्णवों द्वारा प्रस्तुत किए गए हैं, वृन्दावन के इस उच्चतम आनंद का स्वाद ले सकता है। इस प्रकार कृष्ण चेतना का सर्वोच्च आनंद कहीं भी उपलब्ध है। फिर भी, जो लोग वृंदावन में कृष्ण के साथ सीधे रह सकते हैं और उनकी संगति का न केवल अपने कानों से बल्कि अपनी सभी इंद्रियों से आनंद ले सकते हैं, निश्चित रूप से वे सबसे अधिक भाग्यशाली हैं। इसलिए वेदों के विद्वान यह निष्कर्ष निकालते हैं कि जीवन की सबसे बड़ी पूर्णता यह है कि व्रज-वासियों के पदचिह्नों पर सफलतापूर्वक चलना और समय के साथ व्रज-वासियों के शाश्वत निवास में रहने के लिए आमंत्रित किया जाना चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥