श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 5: प्रिय (प्रिय भक्त)  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  1.5.9 
अन्ये ’वताराश् च यद्-अंश-लेशतो
ब्रह्मादयो यस्य विभूतयो मताः
माया च यस्येक्षण-वर्त्म-वर्तिनी
दासी जगत्-सृष्ट्य्-अवनान्त-कारिणी
 
 
अनुवाद
भगवान के अन्य सभी अवतार उनके पूर्ण अंशों के अंश मात्र से ही विस्तारित होते हैं। ब्रह्मा जैसे महान देवता उनके भौतिक ऐश्वर्य माने जाते हैं। और प्रकृति उनकी दासी है। उनकी सेवा में सदैव तत्पर रहकर, वह ब्रह्मांड की रचना, रक्षा और संहार करती है।
 
All other incarnations of the Lord are mere expansions of His full essence. Great deities like Brahma are considered His material opulences. And nature is His servant. Always ready to serve Him, she creates, protects, and destroys the universe.
तात्पर्य
मत्स्य और कूर्म जैसे अवतार कृष्ण की शक्ति का आंशिक ही प्रकटीकरण करते हैं, पृथु महाराज जैसे अवतार उनकी महिमा के छोटे आंशिक सशक्तिकरण वाले जीव हैं और ब्रह्मा और अन्य देवता कृष्ण की रचनात्मक शक्तियों का भौतिक प्रतिबिंब हैं। वैदिक ग्रंथों के अधिकारी आमतौर पर देवताओं और कृष्ण की अन्य भौतिक विभूतियों को लीला अवतार नहीं मानते हैं। उनका तर्क यह है कि भौतिक ब्रह्मांड के निर्माण में प्रभु की लीला उनके व्यक्तिगत आनंद तत्परताओं के समान पारलौकिक स्तर पर नहीं है, जिसमें वह प्रह्लाद और हनुमान जैसे प्रेममय भक्तों के साथ पारस्परिकता करते हैं। श्रीमद-भागवतम (2.6.43-46) के दूसरे कांड में ब्रह्मा इसे नारद को समझाते हैं:

अहं भवो यज्ञ इमे प्रजेशा

दक्षादयो ये भवदादयश्च

स्वर लोक पालाः खग लोक पाला

नृ लोक पालाः तल लोक पालाः

गंधर्व विद्याधर चारणेशा

ये यक्ष रक्षोरग नाग नाथाः

ये वा ऋषीणां ऋषभाः पितॄणां

दैत्येन्द्र सिद्धेश्वर दानवेंद्राः

अन्ये च ये प्रेत पिशाच भूत

कूष्मांड यादो मृग पक्ष्य अधीशाः

यत किंच लोक भगवन महसवद्

ओजः सहसवद् बलवत् क्षमावत्

श्री ह्री विभूत्य आत्मवद् अद्भुतार्णं

तत्वं परं रूपवद् अस्वरूपं

"चाहे साकार हो या निराकार, भौतिक जगत में कोई भी प्राणी जो असाधारण रूप से शक्ति, शक्ति, सुंदरता, धन, प्रजनन, विनम्रता, क्षमा, या मानसिक और अवधारणात्मक निपुणता से संपन्न हो, वह विशेष सत्य और भगवान का रूप प्रतीत हो सकता है। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। यह मुझ (ब्रह्मा), भगवान शिव, भगवान विष्णु और दक्ष और प्रजापति जैसे जीवित प्राणियों के महान उत्पादकों पर लागू होता है। यह आप (नारद और कुमारों) और इंद्र और चंद्र जैसे स्वर्गीय देवताओं पर लागू होता है। यह भूर्लोक ग्रहों, सांसारिक ग्रहों, निचले ग्रहों और गंधर्व, विद्याधर और चारण ग्रहों के नेताओं पर लागू होता है। यह यक्ष, राक्षस और उरगों के नेताओं पर लागू होता है। और यह महान ऋषियों, महान राक्षसों, महान नास्तिकों और महान अंतरिक्ष यात्रियों के साथ-साथ शवों, बुरी आत्माओं, शैतानों, जिन्न, कुष्मांड, महान जलीय जीवों, महान जानवरों और महान पक्षियों पर भी लागू होता है। वे केवल भगवान की अलौकिक शक्ति के अंश हैं।

प्रधान्यतो यान ऋष आमनन्ति

लीलावतारान पुरुषस्य भूमनः

आपीयतां कर्ण कषाय शोषण

अनुक्रमिषे त इमान सु पेशन

"हे नारद, अब मैं लीला अवतार कहलाने वाले भगवान के अलौकिक अवतारों को एक के बाद एक बताऊंगा। उनकी गतिविधियों के बारे में सुनने से कान में जमा सभी गंदे पदार्थ खत्म हो जाते हैं। ये लीलाएँ सुनने में आनंददायक हैं और इनका आनंद लेना है। इसलिए वे मेरे हृदय में हैं।"

दूसरे कांड के इन छंदों पर टिप्पणी करते हुए, श्रील श्रीधर स्वामी बताते हैं कि इस दुनिया में परम व्यक्ति के कई भव्य विस्तार हैं और उनमें से प्रत्येक परम भगवान की शक्ति के एक हिस्से को प्रदर्शित करता है। कुछ महान महस (शारीरिक शक्ति) प्रदर्शित करते हैं, अन्य ओजस (संवेदी शक्ति) प्रदर्शित करते हैं, और फिर भी अन्य सहस (मानसिक शक्ति), बाला (वफादारी), श्री (सुंदरता), ह्री (कर्म संबंधी उलझाव से बचना), विभूति (धन), आत्मा प्रदर्शित करते हैं। (बुद्धि), या अद्भुत-अर्ण (आश्चर्यजनक तेज)।

ब्रह्मा भगवद-गीता के दसवें अध्याय में कथा करते हैं कि भगवान विष्णु और शिव के साथ गुना-अवतार (स्वयं, विष्णु और शिव) परम व्यक्ति की भौतिक संपन्नता के रूप में हैं। लेकिन प्राधान्यतो यैन से शुरू होने वाले श्लोक से ब्रह्मा भगवान के अलौकिक लीला अवतारों का अलग से वर्णन करते हैं। ब्रह्मा केवल इन लीला-अवतारों में से सबसे प्रमुख की गणना करते हैं, क्योंकि विष्णु के कई कम प्रसिद्ध लीला अवतार हैं जो कभी सूचीबद्ध नहीं हो सकते। जैसा कि श्री सूत गोस्वामी कहते हैं:

अवतारा ह्य असंख्हेया

हरेश सत्व निधेर् द्विजाः

यथाविदासिनाः कुल्यः

सरसः स्युः सहस्रशः

"हे ब्राह्मणों, भगवान के अवतार असंख्य हैं, अटूट जल स्रोतों से बहने वाली नदियों की तरह।" (भागवत १.३.२६) श्री कृष्ण सत्व-निधि हैं, सत्व के सभी सत्व का मूल स्रोत, जिसे श्रील सनातन गोस्वामी ने यहां "करुणा" के रूप में परिभाषित किया है। भगवान कई रूपों में भौतिक दुनिया में उतरकर इस करुणा को व्यक्त करते हैं, जो कि उनके "अटूट स्रोत" से बहने वाली सभी माध्यमिक "नदियाँ" हैं।

ब्रह्मा, विष्णु और शिव प्रकृति के गुणों पर शासन करने वाले भगवान की शख्सियत के अवतार हैं; तीनों भक्त केवल भौतिक संपन्नता के नहीं हैं। लेकिन क्योंकि ब्रह्मा और शिव भक्तों की भूमिका निभाते हैं और कृष्ण चेतना के उपदेशक के रूप में काम करते हैं, इसलिए उन्हें कभी-कभी कृष्ण की विभूतियों में गिना जाता है। भगवान विष्णु समय-समय पर ब्रह्मा और शिव के साथी के रूप में प्रकट होते हैं, और इसलिए उन्हें कभी-कभी सर्वोच्च की भौतिक विभूति के रूप में भी वर्णित किया जाता है। उदाहरण के लिए, भगवान विष्णु प्रत्येक मन्वंतर में यज्ञ आदि रूपों में अवतार लेते हैं। कड़ाई से बोलते हुए, यज्ञ और अन्य मन्वंतर-अवतार लीला अवतार हैं, लेकिन उन्हें विभूति भी माना जाता है क्योंकि वे ब्रह्मा और शिव के साथ विभिन्न मनुओं के शासन को कायम रखने के लिए सहयोग करते हैं और क्योंकि वे कभी-कभी इंद्र का पद स्वीकार करते हैं।

भगवान के सभी अवतार और विभूतियाँ श्री कृष्ण में निहित हैं। माया, भौतिक अस्तित्व की नियंत्रक, उसके साथ घनिष्ठ प्रेममय संबंध नहीं रख सकती है, लेकिन एक नौकरानी के रूप में लगातार उसकी सेवा करनी चाहिए। वह गुण-अवतारों से पहले प्रकट होती है, और वह ब्रह्मांड की रचना करने वाली, पालन करने वाली और विनाश करने वाली है। इस प्रकार ब्रह्मा और शिव, उसके अधीन होने के कारण, भगवान की शख्सियत के नौकर के सेवक के रूप में विनम्रतापूर्वक स्थित हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)