श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 5: प्रिय (प्रिय भक्त)  »  श्लोक 88
 
 
श्लोक  1.5.88 
बन्धु-वत्सल इत्य् आशा-
तन्तुर् यश् चावलम्बते
स त्रुट्येद् यदुभिस् तस्य
गाढ-सम्बन्ध-मर्शनात्
 
 
अनुवाद
मेरी आशा का अंतिम धागा - कि कृष्ण सदैव अपने मित्रों और संबंधियों के प्रति दयालु हैं - आसानी से टूट सकता है यदि मैं केवल यह विचार करूं कि वे यदुओं से कितनी दृढ़ता से जुड़े हुए हैं।
 
My last thread of hope—that Krishna is always kind to his friends and relatives—could easily be broken if I merely considered how strongly he was attached to the Yadus.
तात्पर्य
युधिष्ठिर भी यही नतीजे पर पहुँचे कि पाण्डव, द्वारका के यादवों से कृष्ण का ध्यान अपनी ओर खींचने की उम्मीद नहीं कर सकते। कृष्ण के परिवार के सदस्य होने के नाते, यादवों का कृष्ण पर पहला अधिकार है। वे उनके चाचा, चचेरे भाई और पुत्र हैं। और कुंती के दृष्टिकोण से, पाण्डवों की तुलना में यादव कृष्ण के साथ उनके प्रिय सेवकों के रूप में अधिक मजबूती से जुड़े हुए हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)