श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 5: प्रिय (प्रिय भक्त)  »  श्लोक 85
 
 
श्लोक  1.5.85 
अतस् तद्-दर्शन-त्यक्ताः
सम्पदः परिहृत्य वै
आपदः प्रार्थितास् तस्मिन्
मया तद्-दर्शनापिकाः
 
 
अनुवाद
इसलिए, उनके दर्शन से वंचित होकर, मैंने कृष्ण से प्रार्थना की कि वे हमारा धन छीन लें तथा हमें और अधिक विपत्तियाँ दें, ताकि वे पुनः हमारे दर्शन में आ सकें।
 
Therefore, deprived of his darshan, I prayed to Krishna to take away our wealth and give us more troubles, so that he may come to our darshan again.
तात्पर्य
हालाँकि उसके परिवार ने अपना राज्य पुनः हासिल कर लिया था, फिर भी कुंती सुखी नहीं है, क्योंकि वे अब कृष्ण को नहीं देख सकते। वे तब और अधिक खुश रहते थे जब एक के बाद एक संकट से लड़ते रहते थे। इस प्रकार कुंती ने कृष्ण से प्रार्थना की:

विपदः सन्तु ताः शश्वत्

तत्र तत्र जगद्-गुरो

भवतो दर्शनं यत् स्याद्

अ पुनर-भव-दर्शनम्

"मैं चाहती हूँ कि वे सभी आपदाएँ बार-बार घटित हों ताकि हम आपको बार-बार देख सकें, क्योंकि आपको देखने का अर्थ है कि हम जन्म और मृत्यु को बार-बार नहीं देखेंगे।" (भागवतम 1.8.25)

जिस भक्त ने कृष्ण के चरणकमलों को देखा है, उसे जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति की गारंटी है। लेकिन कृष्णभावनाभावित भक्त यह भी मानते हैं कि यह मुक्ति (अ पुनर-भव-दर्शनम्) कृष्ण की सेवा करने की खुशी की तुलना में कुछ भी नहीं है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)