श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 5: प्रिय (प्रिय भक्त)  »  श्लोक 76
 
 
श्लोक  1.5.76 
श्री-कृष्णोवाच
श्री-कृष्णेन मम प्राण-
सखेन बहुधा त्रपा
निवारणीया दुष्टाश् च
मारणीयाः किलेदृशः
 
 
अनुवाद
श्री कृष्ण (द्रौपदी) ने कहा: कितनी ही बार मेरे अंतरंग मित्र श्री कृष्ण ने मुझे लज्जा से बचाया और कितनी ही बार उन्होंने कौरवों जैसे दुष्ट दुष्टों का वध किया!
 
Sri Krishna (Draupadi) said: How many times did my intimate friend Sri Krishna save me from shame and how many times did he kill wicked villains like the Kauravas!
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)