श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 5: प्रिय (प्रिय भक्त)  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  1.5.44 
धार्ष्ट्यं ममाहो भवतां गुणान् किल
ज्ञातुं च वक्तुं प्रभवेत् स एकलः
निर्णीतम् एतत् तु मया महा-प्रभुः
सो ’त्रावतीर्णो भवतां कृते परम्
 
 
अनुवाद
मेरा अहंकार तो देखो! केवल कृष्ण ही तुम्हारे गुणों को भली-भाँति जान और वर्णित कर सकते हैं। पर कम से कम मुझे तो यह विश्वास है कि परम भगवान् इस जगत में तुम्हारे लिए ही अवतरित हुए हैं।
 
Look at my ego! Only Krishna can truly know and describe your qualities. But at least I believe that the Supreme Lord has descended into this world for you.
तात्पर्य
कृष्ण द्वारा पाण्डवो के साथ व्यवहार से यह स्पष्ट है कि कृष्ण उनके महान स्वभाव को समझते थे। कृष्ण के सिवा कोई भी ये पात्र नहीं था जो उनका साथ दे सके। नारद को भाइयों की कीर्ति करने की अपनी दुस्साहसपूर्ण कोशिश पर शर्म आती है, वह एक तथ्य के आगे झुककर माफी मांगते हैं, वह निश्चित है कि श्री कृष्ण सिर्फ पाण्डवो को प्रसन्न करने और उनकी कीर्ति फैलाने के लिए इस दुनिया में अवतरित हुए हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)