धर्म-राजेन तं द्वारि
तथा प्राप्तं महा-मुनिम्
निशम्य भ्रातृभिर् मात्रा
पत्नीभिश् च सहोत्थितम्
अनुवाद
धर्मराज युधिष्ठिर उस समय अपने निकटस्थ लोगों से परामर्श कर रहे थे कि किसी यज्ञ या विपत्ति के बहाने कृष्ण को कैसे लाया जाए। जब राजा ने सुना कि महर्षि द्वार पर हैं, तो वे तुरन्त अपने भाइयों, माता और पत्नियों के साथ उठ खड़े हुए।
Dharmaraja Yudhishthira was then consulting with his close associates about how to bring Krishna to the temple under the pretext of some sacrifice or calamity. When the king heard that the sage was at the door, he immediately rose with his brothers, mother, and wives.
तात्पर्य
जब नारद नाचते हुए महल के द्वार पर पहुँचे, तो प्रहरी ने तुरंत राजा युधिष्ठिर को सूचित किया। राजा और उनका परिवार नारद का अभिवादन करने के लिए एक साथ खड़े हो गए, हालाँकि वे लगातार कृष्ण को हस्तिनापुर आने के लिए मनाने की युक्ति पर विचार कर रहे थे। पहले विचार था कि भीम या किसी अन्य को कृष्ण को अश्वमेघ यज्ञ के लिए आमंत्रित करने के लिए भेजा जाए, किंतु सभा को लगा कि इस से कृष्ण शीघ्र नहीं आएंगे, क्योंकि यज्ञ की व्यवस्था में अधिक समय लगता है। दूसरा प्रस्ताव कि कृष्ण से हस्तिनापुर को शत्रु के आक्रमण से बचाने में मदद करने के लिए कहा जाए। यद्यपि न किसी अन्य यज्ञ की आवश्यकता थी और न नगर पर आक्रमण का कोई भय था, फिर भी पाण्डव कृष्ण का सङ्ग पाने के लिए किसी भी उपाय की योजना बना रहे थे। सामान्य रूप से परम भगवान के भक्तों दो तरह के संकटों का सामना करना पड़ता है, एक स्वयं भगवान द्वारा अपने भक्तों के यश का विस्तार करने के लिए निर्मित होता है, और दूसरा अपने भक्तों की तीव्र उत्कटता पर भगवान द्वारा निर्मित होता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥