श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 5: प्रिय (प्रिय भक्त)  »  श्लोक 113
 
 
श्लोक  1.5.113 
जित-वाक्-पति-नैपुण्य
यद् इदं नस् त्वयोदितम्
तद् असम्भावितं न स्याद्
यादवेन्द्र-प्रभावतः
 
 
अनुवाद
आप वाणी के स्वामी ब्रह्मा की बुद्धि को भी पराजित कर सकते हैं। अतः हमारे भगवान यादवेन्द्र की शक्ति से, आपने हमसे जो कहा है, वह असत्य नहीं हो सकता।
 
You can even defeat the wisdom of Brahma, the master of speech. Therefore, by the power of our Lord Yadavendra, what you have told us cannot be false.
तात्पर्य
एक ओर नारद की बातें सुन रहे यादव, नारद के द्वारा अपने बारे में कही गई बातों को अतिशयोक्ति के तौर पर मान रहे थे। इसलिए वे नारद को शब्दों का सबसे बड़ा खिलाड़ी कह रहे थे। दूसरी ओर, जब कृ्ष्ण व्यक्तिगत रूप से शामिल थे तो कुछ भी असंभव नहीं था। वे उनके परिवार के सदस्य थे और नारद उनके शाश्वत वैकुण्ठ सहयोगियों में से एक थे। इसलिए उन्हें नारद के कथनों को सत्य मानने के लिए मजबूर होना पड़ा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)