जब ब्रह्मा और अन्य देवताओं ने विलाप करती धरती माता की बात सुनी, तो वे सभी मिलकर क्षीरसागर के तट पर खड़े होकर कठोर व्रतों का पालन करने लगे। उन्होंने प्रार्थनाएँ कीं और पूर्ण एकाग्रता से भगवान का ध्यान करते हुए उनकी आराधना की। फिर भी, वे उनकी कृपा प्राप्त करने में असमर्थ रहे।
When Brahma and the other gods heard Mother Earth's lamentations, they all gathered together on the banks of the Kshirsagar and began observing strict fasts. They offered prayers and worshipped the Lord, meditating on Him with complete concentration. Yet, they were unable to obtain His grace.
तात्पर्य
द्वापर युग के अन्त में जब अधर्मी राजाओं की फौज ने धरती का बोझ बढ़ा दिया, ब्रह्माण्ड के शासकों को स्वयं इसका ज्ञान हो गया कि योग की समाधि में हृदय के ध्यान को केन्द्रित करके सर्वोच्च पुरुष को आसानी से नहीं देखा जा सकता। धरती माता को उसके संकट से मुक्त कराने के लिए देवताओं ने कठोर शपथ लिए, अपने खान पान और यहाँ तक कि सांस लेने को भी सीमित कर अपनी मानसिक एकाग्रता को बढ़ाने के लिए। फिर वे क्षीर सागर के तट पर पहुँचे जो उस द्वीप को चारों ओर से घेरे हुए है जहाँ भगवान क्षीरोंदक-शायी विष्णु निवास करते हैं। उन्होंने उनकी प्रसन्नता के लिए पुरूष सूक्त और अन्य वैदिक मन्त्रो का उच्चारण किया और उनके ऊपर अपने बाहरी तथा भीतरी इन्द्रियों को केन्द्रित करने का प्रयास किया। लेकिन इसके बाद उन्हें उनके सन्तुष्टि का कोई भी चिन्ह प्राप्त नहीं हुआ - उन्हें अभयदान देने वाला ना तो एक भी शब्द ना ही एक भी मुद्रा। श्रीमद् भागवतम के दसवें स्कंध के पहले अध्याय में दर्ज इस अनुभव से देवताओं ने सीखा की रूढ़िबद्ध ध्यान सर्वोच्च भगवान के साथ निजी संगति प्राप्त करने का कारगर माध्यम नहीं है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥