प्राचीन काल में जब मधु नामक राक्षस ने मथुरा पर शासन किया था, तो उसका साम्राज्य पश्चिमी महासागर तक फैला था और उसमें द्वारका क्षेत्र भी शामिल था। श्री हरिवंश पुराण में स्वयं मधु के शब्दों से इसकी पुष्टि की जाती है, जो विकद्रु के दामाद से कहे गए थे:
स्वागतं वत्स हर्यश्व
प्रीतोऽस्मि तव दर्शनात्
यद एतन्मम राज्यं वै
सर्वं मधु-वनं विना
ददामि तव राजेन्द्र
वासाश्च प्रतिगृह्यताम्
पालयैनं शुभं राष्ट्रं
समुद्रान् उपभूषितम्
गो-समृद्धं श्रीया युष्टं
आभीर-प्राय-मानुषम्
अत्र ते वसतास्तात
दुर्गं गिरि-पुरं महत्
भविता पार्वीवावासः
सुराष्ट्र-विषयो महान्
अनुपविषयश्चैव
समुद्रान्ते निर्आमयः
आनर्तं नाम ते राष्ट्रं
भविष्यत्य आयतं महत्
"स्वागत है, प्रिय बेटे हर्यश्व! मुझे तुम्हें देखकर अच्छा लगा। मैं तुम्हें यह देता हूं, मेरा पूरा राज्य, सिवाय मधुवन के जंगल के। कृपया यहां रहने और इस शानदार राज्य पर शासन करने के लिए सहमत हो जाओ। समुद्र के तटों से आच्छादित, यह गायों से समृद्ध है और अधिकांशतः आभीर ग्वालों से घिरा हुआ है। आपके यहां रहने के दौरान, सौराष्ट्र जिले में राजाओं के निवास के योग्य और किसी भी अन्य शाही संपत्ति के बराबर एक महान पहाड़ी किला होगा। आपके विशाल साम्राज्य को आनर्त कहा जाएगा।"
कभी-कभी, ज़ाहिर है, मथुरा की भूमि को छोटा माना जाता है। उदाहरण के लिए, वराह पुराण (158.1) में, हम परम भगवान को "मेरे मथुरा जिले के बारे में बोलते हुए सुनते हैं, जो बीस योजन तक फैला हुआ है" (विंशति-योजननां तु/ माथुरं मम मंडलम)। छोटा मथुरा-मंडल वह क्षेत्र है जिस पर श्री नंद-नंदन के पैरों के निशान अंकित हैं, जो अक्सर वहां घूमते हैं और अपनी गायों की देखभाल करते हुए खेलते हैं।
भौतिक दुनिया के निर्माता भगवान की परम विभूति द्वारका में प्रकट होती है क्योंकि द्वारका अधिक मथुरा का हिस्सा है। इसलिए द्वारका का महिमामंडन भी, वास्तव में, मथुरा का महिमामंडन है।
