श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 4: भक्त (भक्त)  »  श्लोक 85
 
 
श्लोक  1.4.85 
अहो महा-प्रभो भक्त-
वात्सल्य-भर-निर्जित
करोष्य् एवम् अपि स्वीय-
चित्ताकर्षक-चेष्टित
 
 
अनुवाद
हे स्वामियों के स्वामी, आप अपने भक्तों के प्रति अपने महान स्नेह से वशीभूत हैं! इसी प्रकार आप उनके हृदयों को आकर्षित करते हैं।
 
O Lord of lords, You are captivated by Your great affection for Your devotees! Thus You attract their hearts.
तात्पर्य
अब हनुमानजी भगवान कृष्ण से कहते हैं, "आप समस्त लोकों के स्वामी हैं, फिर भी आप पाण्डवों के सारथी और आज्ञाकारी हो गये हैं। यह संभव है, क्योंकि आपकी भक्त-वात्सल्यता आपको उनका दास बना देती है। अब आप स्वतंत्र नहीं रह गये हैं, आप अपने भक्तों की इच्छानुसार विवश होकर काम करते हैं।" अनेक प्रसंगों पर भगवान ने अपने भक्तों पर अपनी निर्भरता स्वीकार की है। उदाहरणस्वरूप उन्होंने एक बार दुर्वासामुनि से कहा था -

अहं भक्त-पराधीनो

ह्यस्वतंत्र इव द्विज

साधुभिः ग्रस्त-हृदयो

भक्तैर्भक्त-जन-प्रियः

"मैं पूर्णतः अपने भक्तों के वश में हूँ। वस्तुतः मैं स्वतंत्र नहीं हूँ। मेरे भक्त भौतिक इच्छाओं से रहित होते हैं, इसलिये मैं उनके हृदय में स्थित होता हूँ। मेरे भक्तों के बारे में तो कहना ही क्या है, उनके भक्त भी मुझे प्रिय होते हैं।" (भागवत ९।४।६३)

किन्तु क्या प्रभु की स्वतंत्रता की हानि से उनके भक्तों को कष्ट नहीं होता? नहीं, भगवान का एक-एक कार्य भक्तों के हृदय को आकर्षित करता है, उन्हें आनंद से भर देता है। वे केवल भक्तों की संतुष्टि के लिये कार्य करते हैं और सदैव यह सावधानी रखते हैं कि भक्तों को कोई कष्ट न पहुँचे। भगवान ने अपने वचनों में कहा है कि वे भक्त-जन-प्रिय हैं, अर्थात वे सदैव भक्तों की प्रसन्नता के लिये चिंतित रहते हैं। कृष्ण को अर्जुन का सारथी बनते और युधिष्ठिर का आदर करते देख वैष्णव प्रसन्न होते हैं, क्योंकि कृष्ण और पाण्डवों के मध्य हुए ये प्रेम के आदान-प्रदान दोनों, भगवान और उनके द्वारा चुने गये सेवक की महिमा बढ़ाते हैं। एक सावधान अभिभावक की भाँति, परमेश्वर अपने समस्त कार्यो द्वारा भक्तों के आध्यात्मिक विकास को पोषित करते रहते हैं

मूहुर्तेनापि संहर्तुं

शक्तो यद्यपि दानवान्

मद्भक्तानां विनोदार्थं

करोमि विविधाः क्रियाः

दर्शनध्यानसंस्पर्शैः

मत्स्यकूर्मविहंगमाः

स्वान्यपत्यानि पुष्णन्ति

तथाहमपि पद्मज

"यद्यपि सब दानवों का नाश कुछ ही मिनटों में संभव है, तो भी मैं अपने भक्तों का मनोरंजन करने के लिये नाना प्रकार की लीलाएँ करता हूँ। जैसे मछली, कछुआ और पक्षी अपनी संतान का पालन देखकर, ध्यान करके और शारीरिक संपर्क बनाकर करते हैं, उसी प्रकार मैं भी अपने भक्तों का पालन करता हूँ।" (पद्म पुराण)

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)