श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 4: भक्त (भक्त)  »  श्लोक 83
 
 
श्लोक  1.4.83 
नूनं रे पाण्डवा मन्त्रम्
औषधं वाथ किञ्चन
लोकोत्तरं विजानीध्वे
महा-मोहन-मोहनम्
 
 
अनुवाद
आह, आप पाण्डवों को अवश्य ही कोई दिव्य जड़ी-बूटी या मंत्र ज्ञात होगा जो सबसे शक्तिशाली जादूगर को भी मोहित कर सकता है।
 
Ah, you Pandavas must know some divine herb or mantra that can mesmerize even the most powerful magician.
तात्पर्य
क्योंकि पाण्‍डव प्रेम के वशीभूत हैं, अत: तर्क और शिष्टाचार के उल्‍लंघन के लिए उन्‍हें माफ किया जा सकता है। परन्‍तु भगवान की निजी विशेषता वाले व्‍यक्तित्‍व के साथ हल्‍के ढंग से क्‍यों व्यवहार किया जाता है? हनुमान का यह अनुमान है कि भाइयों को अवश्‍य कोई ऐसी जादूगरी आती होगी जिससे प्रभु को वशीभूत किया जा सके। कृष्‍ण परम जादूगर हैं और सभी के वशीकरणकर्ता हैं; इसलिए जो भी उन्‍हें वशीभूत कर सकता है, वह असाधारण होना चाहिए। ऐसा कोई जादुई जड़ी-बूटी या मंत्र इस दुनिया में कहीं नहीं पाया जा सकता है। इस जादू की असली पहचान का खुलासा हनुमान केवल 85वें पाठ में करेंगेः कृष्‍ण केवल अपने घनिष्‍ठ भक्‍तों के परिपूर्ण प्रेम से वशीभूत होते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)