तात प्रशमयोपेही
स्व-पित्रे कुपितम् प्रभुम
"हे मेरे प्यारे पुत्र, प्रभु नृसिंहदेव तुम्हारे राक्षस पिता से अत्यंत क्रोधित हैं। कृपया आगे बढ़ो और प्रभु को प्रसन्न करो।" (भागवतम 7.9.3)
प्रहलाद पूर्ण समर्पण के साथ प्रभु के चरणों में गिर पड़े, लेकिन प्रभु ने उन्हें उठाकर उन पर स्नेह की वर्षा की:
स्व-पाद-मूले पतितम् तम अर्बकम्
विलोक्य देवः कृपया परिप्लुतः
उत्थाप्य तच्छीर्ष्ण्य अधात् करांबुजम्
कालाही-वित्रस्ता-धियाम् कृताबयम्
"जब प्रभु नृसिंहदेव ने देखा कि छोटा बालक प्रहलाद महाराज उनके चरण कमलों में प्रणाम कर रहा है, तब वह अपने भक्त के प्रति स्नेह में अति आनंदित हुए। प्रहलाद को उठाते हुए, प्रभु ने अपने कमल हाथ को बालक के सिर पर रखा क्योंकि उनका हाथ हमेशा अपने सभी भक्तों को निडरता प्रदान करने के लिए तैयार रहता है।" (भागवतम 7.9.5)
इसी प्रकार, बृहान्नारसिंह पुराण में लिखा है, लिलिहे तस्य गात्राणि/ स्व-पोटस्येव केसरी: "प्रभु नृसिंह ने प्रहलाद के अंगों को चाटा जैसे एक साधारण शेरनी अपने शावक को संवारती है।"
