sārathya-pāraṣada-sevana-sakhya-dautya-
vīrāsanānugamana-stavana-praṇāmān
snigdheṣu pāṇḍuṣu jagat-praṇatiṁ ca viṣṇor
bhaktiṁ karoti nṛpatiś caraṇāravinde
"महाराजा परीक्षित ने सुना कि प्रभु कृष्ण (विष्णु), जिनका हर जगह पालन होता है, उन्होंने बिना वजह दया करके पांडु के नरम बेटों की बहुत तरह से सेवा की थी। प्रभु ने पांडवों की मर्ज़ी के अनुसार रथ चालक से लेकर अध्यक्ष, दूत, दोस्त और रात के पहरेदार तक के पदों को स्वीकार किया जैसे कि वो उनका सेवक हो और उनके आगे छोटे की तरह नतमस्तक हुए। जब महाराजा परीक्षित ने ये सुना, तो अपने प्रभु के चरण कमलों के लिए ये श्रद्धा से भर उठे।"
हनुमान जी ने जो कविता बोली है, उसमें कृष्ण और पांडवों के बीच दोस्ती का ज़िक्र नहीं किया है क्योंकि उनके बीच के ये सारे लेनदेन उस नीचे छिपे रिश्ते की वजह से होते थे।
