श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 4: भक्त (भक्त)  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  1.4.63 
कृताभिवन्दनस् तत्र
प्रयत्नाद् उपवेशितः
सम्पत्तिं प्रेम-जां चित्रां
प्राप्तो वीणाश्रितो ’ब्रवीत्
 
 
अनुवाद
नारद ने हनुमानजी के मंदिर में भगवान का सम्मान किया, और हनुमानजी ने नारदजी के बैठने की व्यवस्था की। नारदजी को लगा कि अब उन्हें भगवान के प्रति शुद्ध प्रेम से उत्पन्न एक अद्भुत निधि प्राप्त हो गई है। उन्होंने अपनी वीणा उठाई और बोले।
 
Narada paid his respects to the Lord at Hanuman's temple, and Hanuman arranged for Narada to sit. Narada felt he had now attained a wonderful treasure born of pure love for the Lord. He picked up his veena and spoke.
तात्पर्य
भगवान श्री रामचन्द्रजी के देवता को साष्टांग दंडवत प्रणाम करने के बाद नारद को अनेक प्रकार के आनंद हुए जिससे अपने आप ही उनके शरीर में कंपन, पसीना, रोमांच और गला भर आया। ऐसी अवस्था में उन्होंने अपनी वीणा बजाना शुरू किया लेकिन उनसे एक भी सुर न निकला। इसके बजाय वह वीणा पर ही लटकने लगे क्योंकि उन्हें डर था कि वह जमीन पर गिर पड़ेंगे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)