वहाँ किम्पुरुष वर्ष में नारद जी ने देखा कि हनुमान जी वन से प्राप्त विविध वस्तुओं से भगवान रामचन्द्र के चरणकमलों की पूजा में तल्लीन हैं, मानो पहले की भाँति साक्षात् भगवान की सेवा कर रहे हों।
There, in the year Kimpurusha, Narada saw Hanuman engrossed in worshipping the lotus feet of Lord Ramachandra with various things obtained from the forest, as if he was serving the Lord in person as before.
तात्पर्य
हनुमान की पूजा करने की विधि व्यक्तिपरक थी। वह इस बात को भी भूल जाता था कि वह अपने स्वामी की स्थापित देवता के सामने खड़ा है। उसे ऐसा लगता था मानो वह जंगल में स्वामी के साथ रह रहा हो, जैसा कि वह पहले किया करता था।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥