चूँकि विजय के पश्चात् भगवान रामचंद्र के साथ हनुमान का जीवन अत्यधिक सौभाग्यशाली था, इसलिए यह प्रश्न उठ सकता है कि हनुमान कभी भगवान् की संगति को कैसे छोड़ सकते थे। वह अन्य निवासियों सहित भगवान् राम के साथ वैकुंठ में अयोध्या क्यों नहीं लौटे? इसका उत्तर यह है कि उनके भगवान् ने विशेष रूप से उनसे पृथ्वी पर ही रहने को कहा। आत्मेश्वर का अर्थ है "उनके अपने भगवान्" और इसका अर्थ "सभी आत्माओं के भगवान्" भी है। दूसरे शब्दों में, इस दुनिया में रहकर हनुमान ने उसके सभी निवासियों को विशुद्ध भक्ति सेवा के मार्ग पर चलने का एक बेहतर अवसर दिया। भगवान् रामचंद्र ने हनुमान को यह कठिन त्याग करने का आदेश इसलिए दिया क्योंकि भगवान् संसारी जीवों पर ऐसी कृपा करना चाहते थे। भगवान् से वियोग में रहना हनुमान का सबसे कठिन और गौरवशाली सेवा कार्य है।
