श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 4: भक्त (भक्त)  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  1.4.37 
निरुपाधि-कृपार्द्र-चित्त हे
बहु-दौर्भाग्य-निरूपणेन किम्
तव शुग्-जननेन पश्य तत्-
करुणां किम्पुरुषे हनूमति
 
 
अनुवाद
हे नारद, आपका हृदय अहैतुकी करुणा से ओतप्रोत है। मैं अपने सारे दुर्भाग्य का वर्णन क्यों करूँ, जिससे आप केवल दुखी होते हैं? इसके बजाय, कृपया किम्पुरुष हनुमान पर भगवान की कृपा का ध्यान करें।
 
O Narada, your heart is filled with causeless compassion. Why should I describe all my misfortunes, which only sadden you? Instead, please meditate on the Lord's grace upon the great man Hanuman.
तात्पर्य
क्योंकि नारद स्वभाव से ही सभी दुखी आत्माओं के लिए स्वाभाविक रूप से करुणामय हैं, प्रह्लाद सोचते हैं कि नारद केवल अतिरंजित प्रशंसा के शब्दों से उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए ऐसा कह रहे हैं। और इसलिए प्रह्लाद सोचते हैं कि अपने स्वयं के दुर्भाग्य का वर्णन करना जारी रखने से उनके आध्यात्मिक गुरु नारद को संकट होगा, जिसके परिणामस्वरूप गुरु-अपराध होगा। नारद किसी में भी दुख को सहन नहीं कर सकते, खासकर अपने शिष्य में। क्योंकि नारद सर्वोच्च प्रभु की दया के सच्चे प्राप्तकर्ता को खोजने के लिए आशान्वित हैं, प्रह्लाद हनुमान को एक विकल्प के रूप में प्रस्तावित करके नारद का ध्यान भटकाने की कोशिश करते हैं। वे नारद से कहते हैं, पश्य: "इस पर केवल मेरी बात न मानें। कृपया उनकी महिमा स्वयं देखने जाएँ।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)