बलिर विष्णु-बलाक्रान्तो
बद्धस्तव पिता नृप
सलिलौघाद्विनिःसृत्य
क्वचिद्राज्यमवाप्स्यति
“मेरे प्रिय राजा, आपके पिता बलि को विष्णु की ताकत से हरा दिया गया है और अब वह कैद में है। लेकिन भविष्य में वह विशाल समुद्र से भागने में सफल हो जाएगा और कहीं न कहीं एक राज्य प्राप्त करेगा।" सूताल में बलि के निवास को वाल्मीकि के रामायण के उत्तर-कांड (23) के खंड में कारावास के रूप में वर्णित किया गया है जो पाताल क्षेत्र में रावण की विजय का वर्णन करता है। इस तर्क से, प्रह्लाद नारद के शब्दों का (पाठ १३ में) खंडन करते हैं "हे वैष्णवों में श्रेष्ठ , मुझे क्यों कहना चाहिए कि भगवान मुकुंद पर केवल आपकी विजय हुई है? दैत्यों के प्रमुख, आपके पौत्र बलि ने भी उन पर विजय प्राप्त की है।"
नारद यह कहकर जवाब दे सकते हैं कि प्रह्लाद के पास जब चाहें सूताल-लोक में भगवान विष्णु को देखने का अवसर है, जबकि शिव, ब्रह्मा और अन्य महान देवता भी शायद ही उन्हें देख पाते हैं। प्रह्लाद यहाँ यह कहकर इस विचार की पहले से प्रत्याशा करते हैं और उसे निरस्त करते हैं "यदि मैं उन्हें हमेशा देख पाता तो यह मेरे प्रति भगवान की दया का प्रमाण होता, परन्तु फिलहाल मैं यह भी नहीं जानता कि वे कहाँ हैं। और अगर मैं नहीं जानता, तो मैं कैसे स्वतंत्र रूप से उनका दर्शन कर सकता हूँ? कभी-कभी वे यहाँ स्वयं को दिखाते हैं, लेकिन निरंतर नहीं।"
