श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 4: भक्त (भक्त)  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  1.4.32 
बद्ध्वा संरक्षितस्यात्र
रोधनायास्त्य् असौ बलेः
द्वारीति श्रूयते क्वापि
न जाने कुत्र सो ’धुना
 
 
अनुवाद
मैंने कुछ लोगों को कहते सुना है कि अब भगवान बलि को बंदी बनाकर, उसे बंदी बनाए रखने के लिए सुतल में द्वारपाल बनकर रहते हैं। खैर, मैं यह नहीं कह सकता कि भगवान अब कहाँ हैं।
 
I've heard some people say that the Lord now lives in Sutala as a gatekeeper to keep Bali captive. Well, I can't say where the Lord is now.
तात्पर्य
नारद प्रह्लाद से सूताल ग्रह पर मिले, जो बलि महाराज का क्षेत्र था। जैसाकि पहले बताया गया है, प्रह्लाद वहाँ कुछ समय तक भगवान वामन के निमंत्रण पर रुके थे। प्रह्लाद ने प्रतिष्ठित ऋषियों से सुना था कि श्री वामनदेव बलि के द्वार पर केवल बलि को सूताल-लोक से भागने से रोकने के लिए रहते हैं। यह राय बाणासुर को उनके दोस्त कुष्मांड द्वारा श्री हरि-वंश (2.116.44) में व्यक्त की गई है। वहाँ कुष्मांड बलि को सूताल में एक कैदी के रूप में चित्रित करते हैं:

बलिर विष्णु-बलाक्रान्तो

बद्धस्तव पिता नृप

सलिलौघाद्विनिःसृत्य

क्वचिद्राज्यमवाप्स्यति

“मेरे प्रिय राजा, आपके पिता बलि को विष्णु की ताकत से हरा दिया गया है और अब वह कैद में है। लेकिन भविष्य में वह विशाल समुद्र से भागने में सफल हो जाएगा और कहीं न कहीं एक राज्य प्राप्त करेगा।" सूताल में बलि के निवास को वाल्मीकि के रामायण के उत्तर-कांड (23) के खंड में कारावास के रूप में वर्णित किया गया है जो पाताल क्षेत्र में रावण की विजय का वर्णन करता है। इस तर्क से, प्रह्लाद नारद के शब्दों का (पाठ १३ में) खंडन करते हैं "हे वैष्णवों में श्रेष्ठ , मुझे क्यों कहना चाहिए कि भगवान मुकुंद पर केवल आपकी विजय हुई है? दैत्यों के प्रमुख, आपके पौत्र बलि ने भी उन पर विजय प्राप्त की है।"

नारद यह कहकर जवाब दे सकते हैं कि प्रह्लाद के पास जब चाहें सूताल-लोक में भगवान विष्णु को देखने का अवसर है, जबकि शिव, ब्रह्मा और अन्य महान देवता भी शायद ही उन्हें देख पाते हैं। प्रह्लाद यहाँ यह कहकर इस विचार की पहले से प्रत्याशा करते हैं और उसे निरस्त करते हैं "यदि मैं उन्हें हमेशा देख पाता तो यह मेरे प्रति भगवान की दया का प्रमाण होता, परन्तु फिलहाल मैं यह भी नहीं जानता कि वे कहाँ हैं। और अगर मैं नहीं जानता, तो मैं कैसे स्वतंत्र रूप से उनका दर्शन कर सकता हूँ? कभी-कभी वे यहाँ स्वयं को दिखाते हैं, लेकिन निरंतर नहीं।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)