श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 1: प्रथम-खण्ड: श्री भगवत कृपा सार निधार  »  अध्याय 4: भक्त (भक्त)  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  1.4.30 
आत्म-तत्त्वोपदेशेषु
दुष्पाण्डित्य-मयासुरैः
सङ्गान् नाद्यापि मे शुष्क-
ज्ञानांशो ’पगतो ’धमः
 
 
अनुवाद
राक्षस अपनी शिक्षाओं में सदैव आत्म-सत्य के विषय में घटिया विद्वत्ता की ओर प्रवृत्त रहते हैं। ऐसे राक्षसों के साथ मेरे संबंध के कारण, आज भी मेरी समझ शुष्क अटकलों के पतित तत्व से मुक्त नहीं है।
 
Demons in their teachings always tend toward poor scholarship regarding self-truth. Because of my association with such demons, even today my understanding is not free from the degenerate element of dry speculation.
तात्पर्य
प्रह्लाद जोर देते हैं कि इससे पहले कि वो भौतिकवादी इंद्रियतृप्ति में राजा बन कर पड़ें, वो कभी पूरी तरह से आसुरी गुणों से मुक्त नहीं हुए थे। विशेष रुप से वो बाकी असुरों की तरह, अमर आत्मा के बारे में अवैयक्तिक सिद्धांत स्थापित करने में माहिर थे। इस तरह के सिद्धांत दुष्ट विद्वता से भरे होते हैं, जो भगवान के प्रति भक्ति के बिना अवैयक्तिक ज्ञान में जीवन की पूर्णता साबित करने की कोशिश करते हैं। प्रह्लाद सोचते हैं कि दैत्यों के साथ रह कर और उनके व्यवहारों को धारण करके वो अवैयक्तिकता के अनुमान के इस स्वाद से संक्रमित हो गए थे। ये स्वाद "अधामा", नीच और घृणित है क्योंकि ये भक्ति-रस के उन्मादी व्यक्तिगत आदान-प्रदान को नकारता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)